श्रद्धा के नाम पर सैकड़ों किलो प्रसाद बर्बाद!
नरसिंहपुर जवारे विसर्जन शोभायात्रा का चौंकाने वाला दृश्य
क्या स्वाद के लिए शोभायात्रा के भंडारों में जाते हो?
नरसिंहपुर सदर में हाल ही में जवारे विसर्जन की वार्षिक शोभायात्रा का भव्य आयोजन किया गया था। हजारों की तादाद में लोग शामिल हुए, अनेकों भंडारों के पंडाल भी लगे। कोई सब्जी-पूरी वितरित कर रहा था तो कोई खीर-पूरी, नमकीन मट्ठा, शर्बत, बूंदी, तरबूज, केले इत्यादि का वितरण कर रहा था।
श्रद्धा का वातावरण था... भक्ति का माहौल था... सेवा का भाव भी दिख रहा था...
लेकिन इस शोभायात्रा में एक दृश्य ऐसा भी था जो अनेक सवाल खड़े कर रहा था।
लोग प्रसाद लेते... थोड़ा बहुत खाते... और बाकी का हिस्सा सड़क या नाली पर फेंक देते।
कुछ लोग एक पंडाल से दूसरे पंडाल तक सिर्फ स्वाद लेने के लिए घूमते नजर आए। एक जगह पूरी-सब्जी… दूसरी जगह खीर… तीसरी जगह बूंदी… और फिर आधा खाकर बाकी फेंक देना…
क्या यही प्रसाद का सम्मान है?
अनेकों लोगों ने अनाज की बर्बादी की — वह भी सिर्फ स्वाद के लिए!
अगर मोटे तौर पर आकलन किया जाए तो शोभायात्रा में लगभग 8 से 10 हजार लोगों की भीड़ रही होगी। यदि इनमें से मात्र 25 से 30 प्रतिशत लोगों ने भी आधा प्रसाद फेंका हो, तो अनुमानित 300 से 500 किलो तक भोजन सड़क और नालियों में चला गया होगा।
सोचिए — 400 से 500 किलो भोजन का मतलब लगभग 800 से 1000 जरूरतमंद लोगों का पेट भर सकता था।
एक तरफ श्रद्धा का प्रसाद… दूसरी तरफ उसी प्रसाद की सड़क पर बर्बादी…
सबसे बड़ा सवाल
क्या हम शोभायात्रा में श्रद्धा से जाते हैं… या सिर्फ स्वाद लेने के लिए?
आस्था तब सार्थक होती है जब उसमें संवेदनशीलता भी हो। सेवा तब पूर्ण होती है जब उसका सम्मान भी किया जाए।
अनाज की बर्बादी सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है, यह संवेदनहीनता का प्रतीक भी है।
प्रसाद सिर्फ भोजन नहीं होता… वह आस्था का प्रतीक होता है।
शायद अगली बार… प्रसाद लेने से पहले हमें यह जरूर सोचना चाहिए — क्या हम इसे सम्मान देंगे… या सड़क पर फेंक देंगे?
सत्य और समाज के बीच की कड़ी
