यह कैसी आस्था… जिसका प्रदर्शन सड़क पर?
जब लोग पूजा, भजन, ढोल-नगाड़े, उपवास और ध्यान करते हैं तो शरीर ट्रांस अवस्था में चला जाता है और इस दौरान दिमाग एंडोर्फिन छोड़ता है।
एंडोर्फिन शरीर के प्राकृतिक दर्द निवारक होते हैं!इसलिए दर्द बहुत कम महसूस होता है! यही कारण है कि: जीभ छेदने पर भी व्यक्ति सामान्य रहता है,शरीर पर सलाई डालने पर भी ज्यादा दर्द नहीं होता!
इसी प्रकार धार्मिक उत्साह में शरीर में एड्रेनालिन का स्तर भी बढ़ जाता है!इससे दर्द की संवेदना कम हो जाती है!शरीर ज्यादा सहनशील हो जाता है! यह वही स्थिति है जब दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तुरंत दर्द नहीं लगता लेकिन बाद में दर्द महसूस होता है
नवरात्रि आते ही शहर-गांव में एक जैसा दृश्य दिखने लगता है… ढोल बज रहे हैं… जवारे निकल रहे हैं… और अचानक कोई चिल्लाने लगता है — "माता आ गई… माता आ गई…"
फिर वही दृश्य… किसी ने जीभ छेद ली… किसी ने शरीर में बाना डाल लिया… कोई उग्र होकर अजीबो गरीब हावभाव बना रहा है… और आसपास खड़े लोग हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।
लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है…
गांव के लोग भी अब सवाल पूछ रहे हैं
पहले लोग चुप रहते थे… लेकिन अब ग्रामीण भी समझने लगे हैं।
क्योंकि गांव में सब जानते हैं — जो व्यक्ति साल भर सामान्य रहता है… वही अचानक "देवी" आने पर उग्र हो जाता है।
कभी-कभी तो हालत यह होती है कि जिसे गांव वाले रोज शराब पीते देखते हैं… वही नवरात्रि में "देवी" बन जाता है।
देवी का भाव या भीड़ का असर?
गांव में जब:
- ढोल जोर से बजते हैं
- भीड़ जमा हो जाती है
- लोग चिल्लाने लगते हैं
- भावनात्मक माहौल बन जाता है
तो कई लोग भावनात्मक रूप से बह जाते हैं। इसी को लोग "देवी आना" कह देते हैं।
लेकिन यह कोई चमत्कार नहीं… यह भीड़ का असर भी हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक कारण भी समझिए
मनोविज्ञान के अनुसार कई बार "देवी का भाव" व्यक्ति के भीतर दबे हुए भावों का विस्फोट भी होता है।
गांव में अक्सर देखा गया है कि:
- अशिक्षित या अल्प शिक्षित व्यक्ति
- आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति
- समाज में सम्मान न पाने वाले लोग
- शराब या नशे के आदी लोग
- कुंठा या मानसिक दबाव से जूझ रहे लोग
ऐसे लोग जब भीड़ के बीच आते हैं और "देवी भाव" में जाते हैं तो अचानक उन्हें समाज में सम्मान मिलने लगता है।
जो व्यक्ति सामान्य दिनों में नजरअंदाज होता है… वही "देवी आने" के बाद लोगों से घिर जाता है… लोग उसके पैर छूते हैं… उसकी बात को आदेश मानते हैं…
मनोवैज्ञानिक इसे कहते हैं — दबी हुई कुंठा का विस्फोट और पहचान पाने की कोशिश।
यानी:
- जो सामान्य जीवन में कमजोर है
- जो सम्मान नहीं पाता
- जो खुद को साबित करना चाहता है
वह "देवी भाव" के माध्यम से अचानक खुद को शक्तिशाली महसूस करता है।
यह कैसी आस्था जिसका प्रदर्शन सड़क पर हो?
आस्था मन की होती है… शांत होती है… भीतर होती है…
लेकिन अब आस्था भी सड़क पर दिखाई देने लगी है।
कौन ज्यादा बड़ा भक्त है — इसकी जैसे प्रतियोगिता होने लगी है।
- किसी ने जीभ छेद ली
- किसी ने शरीर में बाना डाल लिया
- कोई सड़क पर उग्र होकर चिल्लाने लगा
और फिर भीड़ जमा… मोबाइल चालू… वीडियो वायरल…
आस्था कब अंधविश्वास बन जाती है?
जब:
- लोग बिना समझे नकल करें
- शरीर को नुकसान पहुंचाया जाए
- डर फैलाया जाए कि देवी नाराज़ हो जाएंगी
- उग्र व्यवहार को चमत्कार बताया जाए
तब आस्था धीरे-धीरे अंधविश्वास बन जाती है।
गांव की असली भक्ति
गांव में असली भक्ति आज भी है…
- वह बूढ़ी दादी जो चुपचाप व्रत रखती है
- वह किसान जो सुबह मंदिर जाकर काम पर निकलता है
- वह महिला जो घर में दीप जलाती है
इनकी भक्ति में शोर नहीं होता… प्रदर्शन नहीं होता… लेकिन विश्वास मजबूत होता है।
अब फैसला गांव और समाज को करना है — यह भक्ति है… या भीड़ का असर…?
