पूर्व प्रक्रिया या पारदर्शिता से परहेज़?
RTI निरीक्षण के मामले में उठते गंभीर सवाल
जनसूचना का अधिकार लोकतंत्र की रीढ़ है। लेकिन जब उसी अधिकार के प्रयोग पर तकनीकी शब्दों की आड़ ली जाने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
हाल ही में ग्राम पंचायत आमगांव द्वारा RTI आवेदक [विक्रम सिंह राजपूत] को “पूर्व प्रक्रिया” के नाम पर निश्चित तिथि और समय पर उपस्थित होने का पत्र भेजा गया। जबकि आवेदक ने स्पष्ट रूप से दस्तावेज़ निरीक्षण (Inspection of Records) की मांग की थी।
सवाल यह है कि जब निरीक्षण मांगा गया था, तो पत्र में सीधे “अभिलेख निरीक्षण हेतु उपस्थित हों” क्यों नहीं लिखा गया?
कानून की स्पष्ट व्यवस्था
1 की धारा 2(j) नागरिक को अभिलेखों के निरीक्षण का अधिकार देती है। यदि निरीक्षण मांगा गया है, तो संबंधित अधिकारी को स्पष्ट तिथि, समय और स्थान बताते हुए रिकॉर्ड उपलब्ध कराना होता है।
अधिनियम में “पूर्व प्रक्रिया” नाम का कोई चरण परिभाषित नहीं है। इसलिए ऐसी शब्दावली कानूनी दृष्टि से अस्पष्ट मानी जाएगी।
वैधानिक या अवैधानिक?
निरीक्षण हेतु बुलाना पूर्णतः वैधानिक है। परंतु “पूर्व प्रक्रिया” के नाम पर अस्पष्ट बुलावा देना प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण और पारदर्शिता की दृष्टि से संदिग्ध माना जा सकता है।
RTI बहस का मंच नहीं है — यह सूचना का अधिकार है, और सूचना स्पष्ट भाषा में ही दी जानी चाहिए।
बड़ा प्रश्न
ग्राम स्तर की संस्थाओं से सबसे अधिक पारदर्शिता की अपेक्षा होती है। यदि वही संस्था कानून की भाषा को धुंधला करे, तो नागरिकों का भरोसा कैसे मजबूत होगा?
अधिकारों की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि उसकी स्पष्ट और ईमानदार अनुपालना से होती है।
