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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

कॉमरेड ज्योति पटेल की स्मृति बनी सामाजिक बदलाव की संकल्प सभा

🔴 किसान भवन निर्माण हेतु एक लाख रुपये का योगदान

नरसिंहपुर। ग्राम पचामा की पूर्व सरपंच, प्रखर समाज सुधारक और महिला अधिकारों की मुखर आवाज कॉमरेड ज्योति पटेल अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी समाज को दिशा दे रहे हैं। कैंसर से जूझते हुए 3 फरवरी को उनका निधन हुआ, किंतु जीवन के अंतिम क्षण तक वे सामाजिक कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ डटी रहीं।


उनकी चिता को मुखाग्नि उनकी बेटी जागृति पटेल द्वारा दिया जाना और तेरहवीं जैसी रूढ़ियों का त्याग — यही था उनके विचारों का सच्चा सम्मान।

हजारों लोगों की उपस्थिति में संकल्प

22 फरवरी को ग्राम पचामा में आयोजित स्मृति सभा में हजारों की संख्या में महिला-पुरुष उपस्थित रहे। अध्यक्षता भावसिंह पटेल ने की। कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक, किसान और जनसंगठनों के पदाधिकारियों ने अपने विचार रखे और ज्योति पटेल के संघर्षपूर्ण जीवन को याद किया।

सभा में सीपीआई (एम) के राज्य सचिव जसविंदर सिंह, अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव बादल सरोज, किसान सभा के राज्य महासचिव अखिलेश यादव, जनवादी महिला समिति की राज्य महासचिव प्रीति सिंह सहित अनेक नेताओं ने संबोधित किया।

सदियों से जारी है सामाजिक परिवर्तन की धारा

राज्य सचिव जसविंदर सिंह ने कहा कि सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष कोई नया नहीं है। महात्मा बुद्ध से लेकर कबीर, नानक, मीरा, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर तक — यह परंपरा लगातार आगे बढ़ी है और 21वीं सदी में भी जारी है।

“ज्योति पटेल का जीवन इसी संघर्ष की कड़ी था, और आज की यह सभा उसी धारा को आगे बढ़ाने का संकल्प है।”

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

किसान नेता बादल सरोज ने अपने संबोधन में कहा कि कैंसर जैसी बीमारियों से होने वाली कई मौतें रोकी जा सकती हैं यदि चिकित्सा सुविधाएं सुलभ और सस्ती हों। उन्होंने कहा कि यदि कॉरपोरेट की कुछ दिनों की कमाई को जनस्वास्थ्य पर लगाया जाए तो देश की हर तहसील में एमआरआई मशीन लगाई जा सकती है और मुफ्त जांच व उपचार से हजारों जीवन बचाए जा सकते हैं।

किसान भवन निर्माण की घोषणा

सभा के अंत में कॉमरेड जगदीश पटेल ने सालीचौका में प्रस्तावित किसान भवन निर्माण के लिए एक लाख रुपये देने की घोषणा की। यह भवन आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक शोषण के खिलाफ विचार-विमर्श और संगठन का केंद्र बनेगा।

“स्मृति तभी जीवित रहती है जब वह संघर्ष में बदल जाए।”

अंत में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सभा ने यह संदेश दिया कि विचारों को समाप्त नहीं किया जा सकता — वे पीढ़ियों तक समाज को दिशा देते रहते हैं।

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