सरकारी क्वार्टर के भीतर पनपता अंधेरा
घटना से आगे — मानसिकता का विश्लेषण
उत्तर प्रदेश के बांदा का रहने वाला 55 वर्षीय रामभवन, जो चित्रकूट में सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात था, बाहर से एक सामान्य सरकारी कर्मचारी दिखता था। वह एसडीएम कॉलोनी में अपनी पत्नी दुर्गावती (50) के साथ रहता था। संतानहीन दंपत्ति की यह जिंदगी बाहर से साधारण लगती थी, लेकिन भीतर एक भयावह सच पल रहा था।
बताया जा रहा है कि पति-पत्नी मिलकर गरीब परिवारों के मासूम बच्चों को लालच देकर अपने घर बुलाते थे। कोई मोबाइल में गेम का बहाना, किसी को यूट्यूब दिखाने का लालच, किसी को खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक सामान का प्रलोभन — मासूमियत को फांसने की पूरी साजिश रची जाती थी।
बच्चों की उम्र 5 से 16 वर्ष के बीच बताई गई है। आरोप है कि दोनों मिलकर नाबालिगों के साथ घोर आपराधिक कृत्य करते थे। विरोध करने पर बच्चों को डराया-धमकाया जाता, मारा-पीटा जाता और चुप रहने के लिए पैसे या सामान देकर दबाव बनाया जाता। इतना ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए आपत्तिजनक वीडियो भी रिकॉर्ड किए जाने की बात सामने आई है।
बताया जा रहा है कि यह घिनौना सिलसिला कभी बांदा में किराए के मकान में, तो कभी चित्रकूट में चलता रहा। आरोपों के अनुसार, 50 से अधिक मासूम इस जाल का शिकार बने।
इस हालिया प्रकरण ने समाज को झकझोर दिया है। एक सरकारी कर्मचारी और उसकी पत्नी पर गंभीर आरोपों ने सिर्फ कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। खबरें अपना काम कर चुकी हैं — लेकिन असली सवाल अब यह है कि ऐसी मानसिकता जन्म कैसे लेती है?
यह सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, यह भरोसे, मासूमियत और सामाजिक जिम्मेदारी के खिलाफ किया गया हमला है।
1. शिकार चुनने की सुनियोजित प्रवृत्ति
ऐसे मामलों में अपराध अचानक नहीं होता। यह योजना बनाकर, कमजोर वर्ग को लक्ष्य बनाकर और भरोसा जीतकर अंजाम दिया जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को लालच देना, तकनीक का इस्तेमाल करना — यह सब एक सुनियोजित पैटर्न की ओर संकेत करता है।
2. सत्ता और दंडमुक्ति का भ्रम
जब अपराधी सामाजिक रूप से सम्मानित पद पर होता है, तो उसके भीतर “पकड़े नहीं जाएंगे” का भ्रम विकसित हो सकता है। यह मानसिकता शक्ति के दुरुपयोग और नैतिक पतन की चरम अवस्था को दर्शाती है।
3. दंपत्ति की संयुक्त विकृति
जब पति-पत्नी दोनों किसी अनैतिक कृत्य में सहभागी हों, तो यह मनोविज्ञान की दृष्टि से और भी जटिल हो जाता है। इसे “परस्पर विकृत सहयोग” कहा जा सकता है — जहाँ एक की विकृति दूसरे की चुप्पी या सहमति से और मजबूत होती जाती है।
4. डिजिटल युग का दुरुपयोग
मोबाइल, इंटरनेट और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आज बच्चों की दुनिया का हिस्सा हैं। लेकिन जब इन्हीं साधनों का इस्तेमाल फंसाने और नियंत्रित करने के लिए हो, तो यह तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि खतरा बन जाती है।
सवाल अपराधियों से बड़ा है — क्या हमारी निगरानी, हमारी संवेदनशीलता और हमारी सामाजिक जिम्मेदारी पर्याप्त है?
5. समाज की चुप्पी भी अपराध है
ऐसे अपराध वर्षों तक इसलिए चलते रहते हैं क्योंकि:
- बच्चे डर के कारण बोल नहीं पाते
- परिवार सामाजिक दबाव में चुप रहते हैं
- पड़ोसी संदेह को नजरअंदाज कर देते हैं
यदि किसी बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, अनचाही वस्तुएं मिलें, या असामान्य डर दिखाई दे — तो यह चेतावनी संकेत हो सकते हैं। इन्हें अनदेखा करना समाज की सामूहिक विफलता है।
निष्कर्ष: सिर्फ सजा नहीं, समझ भी जरूरी
गिरफ्तारी और सजा कानून का दायित्व है। लेकिन रोकथाम समाज का दायित्व है। स्कूलों में बाल-सुरक्षा शिक्षा, अभिभावकों की जागरूकता, संस्थागत निगरानी और मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप — यही दीर्घकालिक समाधान हैं।
मासूमियत की रक्षा सिर्फ कानून से नहीं होगी — जागरूक समाज से होगी।
