*सट्टा तो नरसिंहपुर में बंद हो ही नहीं सकता?*
शहर का ऐसा कौन सा कोना है जहां सट्टा नहीं लगाया जा रहा है?कौन सा गांव और कौन सी तहसील सट्टे के खिलाड़ियों के चंगुल से बची है?
हां कुछ दिन धर पकड़ होती है,छोटी मछलियों को पकड़ा भी जाता है लेकिन बड़े मगरमच्छ इस जाल से बाहर ही रह जाते हैं!
कहते हैं कि, पुलिस भी रोके तो कैसे रोके? सुना है, , कोई इस भैया की का आदमी है तो कोई उन भैया जी का आदमी है!
अब बताओ, , भैया जी के आदमी को कोई ऐसे ही हाथ लगा लेगा क्या?अगर ऐसा हो सकता तो रेत खनन कब का बंद हो गया होता!
सोशल मीडिया पर सट्टे को लेकर पत्रकार और स्थानीय लोग चिंता व्यक्त कर रहे हैं!
मीडिया भी रोज अपना गला फाड़ फाड़ कर चिल्ला रहा है!कभी चिचली,कभी भैंसा तो कभी बरहेटा और कभी करकबेल तो कभी बरमान की खबरें चला रहा है लेकिन मजाल कि प्रशासन के कानों पर जूं रेंग जाए!
वैसे तो मीडिया स्थानीय पंचायतों में करप्शन और स्कैम को भी लगातार बताता रहता है, लेकिन वो ये नहीं जानता कि ये पंचायत मंत्री का क्षेत्र है!यहां विकास न हो, ,ऐसा कैसे हो सकता है!
रही बात सट्टे के खेल की तो, , पुलिस अधीक्षक से उम्मीद करें भी या नहीं , , सबसे पहले तो यही सवाल उठता है? गांजा बंद हुआ नहीं, ,जुआ चल ही रहा है, , अब सट्टे के बारे में उम्मीद करें भी तो क्या करें?
सवाल फिर वही — अगर गांजा नहीं रुका, जुआ नहीं रुका, रेत माफिया नहीं रुका, तो सट्टा कैसे रुकेगा?
या फिर मान लें —
यह शहर अब दो हिस्सों में बंट चुका है… एक वो जो कानून की किताब में है, और एक वो जो सेटिंग की डायरी में लिखा है।
और अंत में बात सीधी है —
अगर सच में रोकना हो तो एक हफ्ता काफी है।
लेकिन अगर “चलने देना” हो तो सालों कम पड़ जाते हैं।
अब फैसला शहर को करना है —
हम सट्टे को कोसते रहेंगे,
या उसके पीछे खड़े नामों पर भी सवाल उठाएंगे?
