चिचली जनपद हो, करेली जनपद हो या गोटेगांव जनपद — तस्वीर लगभग एक सी नजर आती है। कागज़ों में विकास दौड़ रहा है, लेकिन ज़मीन पर हालात हांफते दिखाई देते हैं।
सरकारी पोर्टल पर आंकड़े चमक रहे हैं —
✔ सड़क पूर्ण
✔ भवन पूर्ण
✔ भुगतान पूर्ण
लेकिन गांव की टूटी सड़क, अधूरा सामुदायिक भवन और खाली जेब वाला मजदूर पूछ रहा है — “यह पूर्णता आखिर कहां है?”
चिचली में नाली कागज़ों में बन चुकी है, पर बरसात में पानी अब भी घरों में घुसता है! करेली में मजदूरी का भुगतान ऑनलाइन दिख रहा है, लेकिन मजदूर की जेब आज भी हल्की है! गोटेगांव में जांच की घोषणा बार-बार होती है, पर जांच का नतीजा जैसे रास्ता ही भूल जाता है!
विकास का नया गणित
जमीन पर गड्ढा, फाइल में पुल। गांव में सन्नाटा, रिपोर्ट में उपलब्धि। शिकायत दर्ज, कार्रवाई लंबित।
मंचों से भाषण गूंजते हैं — “भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस।” गांव पूछते हैं — “जीरो टॉलरेंस या जीरो एक्शन?”
लाखों के भ्रष्टाचार की चर्चाएं गांव-गांव में हैं। लेकिन कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी है कि लोग अब सवाल भी धीरे-धीरे पूछने लगे हैं।
यदि अपने ही क्षेत्र में पंचायतों की हालत सवालों में हो, तो बाकी प्रदेश के लिए विकास का भाषण थोड़ा ज्यादा ही आत्मविश्वास भरा नहीं लगता?
राजनीति का यह अद्भुत समीकरण है —
काम कम,
प्रचार अधिक,
जांच कम,
घोषणाएं अधिक।
जमीनी सच्चाई की गवाही
कागज़ी आंकड़े भले ही विकास का महाकाव्य लिख रहे हों, लेकिन जमीनी हालात चीख-चीख कर अपनी दुर्दशा की गवाही दे रहे हैं। टूटी सड़कें बयान दे रही हैं, सूखे नल गवाही दे रहे हैं, अधूरे भवन और बंद पड़े शौचालय सच्चाई के दस्तावेज़ बन चुके हैं।
सवाल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, उस व्यवस्था का है जहां भाषण तेज हैं, पर जांच की रफ्तार सुस्त।
अब जनता आंकड़ों से नहीं, अपने गांव की धूल से सच पहचान रही है। और जब यही धूल उड़ती है, तो वह भाषणों की चमक पर जमती जरूर है।
