सुहागरात से थाना…
इश्क नहीं, यह सामाजिक धोखाधड़ी है
सुहागरात… वो रात जिसे दो परिवार सपनों की शुरुआत मानते हैं। लेकिन अगर उसी रात दुल्हन कह दे — “मैं किसी और की अमानत हूं”… तो सवाल सिर्फ एक घर का नहीं रहता, वह पूरे समाज के मुंह पर तमाचा बन जाता है।
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर की घटना कोई “वायरल मसाला” नहीं है। यह एक आईना है। और आईने में चेहरा हमारा ही दिख रहा है।
सुहागरात पर दुल्हन कहती है —
“मैं किसी और से प्यार करती हूं।”
सवाल यह नहीं कि वह किससे प्यार करती है।
सवाल यह है कि फिर शादी क्यों की?
अगर दिल किसी और का था — तो सिंदूर किसलिए?
अगर जीवन किसी और के साथ बिताना था — तो सात फेरे किसलिए?
यह इश्क नहीं है। यह किसी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।
सवाल यह नहीं कि वह किससे प्यार करती है… सवाल यह है कि फिर शादी क्यों की?
अगर दिल कहीं और था तो सात फेरे क्यों?
अगर जीवन किसी और के साथ बिताना था तो सिंदूर किसलिए? अगर प्रेम सच्चा था तो विद्रोह पहले क्यों नहीं? शादी से पहले सच बोलने की हिम्मत नहीं थी, लेकिन शादी के बाद “मेरी लाइफ, मेरी चॉइस” का नारा बुलंद हो गया।
यह आज़ादी नहीं है… यह सुविधा है।
प्यार पवित्र है… लेकिन छल नहीं
प्यार अपराध नहीं है। अपनी पसंद से शादी करना भी अपराध नहीं। अपराध क्या है? किसी और से प्रेम और किसी और से विवाह। माता-पिता से झूठ। दूल्हे से झूठ। और फिर उसी सुहागरात को “क्रांति” घोषित कर देना।
यह साहस नहीं… यह जिम्मेदारी से पलायन है।
नया समाज या नैतिक अराजकता?
आज प्रेम प्रसंगों में हत्या है। आत्महत्या है। धोखा है। और सोशल मीडिया की सनसनी है।
क्या यही नया भारतीय समाज है? जहां इश्क है… पर जिम्मेदारी नहीं। आज़ादी है… पर परिपक्वता नहीं।
क्रांति करनी थी तो मंडप से पहले करते… सुहागरात को मंच क्यों बनाया?
असली संकट क्या है?
अंतिम सवाल
अगर प्यार था तो पहले क्यों नहीं बोले? अगर हिम्मत नहीं थी तो शादी क्यों की? और अगर यही आधुनिकता है… तो फिर धोखा किसे कहेंगे?
समाज बदल रहा है। लेकिन अगर जिम्मेदारी साथ नहीं बदली… तो सुहागरात से थाने तक की दूरी और भी कम होती जाएगी।
