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बरसाना की होली… रंग, रास या बेकाबू हुड़दंग?

रंग के बहाने उमड़ती भीड़… और सवालों के बीच घिरती मर्यादा

बरसाना की तंग गलियों में जैसे ही ढोल की पहली थाप पड़ती है, भीड़ की सांस तेज हो जाती है। ऊपर से उड़ता गुलाल… नीचे से उठता शोर… और बीच में सैकड़ों मोबाइल कैमरे।

लठमार होली का रोमांच अलग है… लेकिन क्या हर रोमांच सुरक्षित भी है?

🎨 रंग के बहाने… या छूने का बहाना?

भीड़ इतनी कि कदम टिकाना मुश्किल। उसी भीड़ में कुछ हाथ — जो रंग से ज्यादा शरीर तलाशते हैं। “बुरा न मानो होली है…” कहकर कोई चेहरा पकड़ लेता है। कोई गाल पर जबरन रंग पोत देता है। कोई हंसी के नाम पर कान के पास झुक आता है।

लड़कियां मुस्कुराती हैं… कभी झेंपकर… कभी मजबूरी में। क्योंकि वहां विरोध करना मतलब भीड़ से टकराना है।

📸 कैमरे और कमेंट की भीड़

राधा रानी मंदिर के आसपास उमड़ती भीड़ में कुछ लोग दर्शन से ज्यादा “दृश्य” तलाशते दिखते हैं। रंग से सने कपड़ों पर फोकस… भीगी साड़ियों पर ठहरी नजरें… और पीछे से आती आवाज — “वीडियो बना… ये सीन वायरल जाएगा!”

जब त्योहार लाइक और व्यू का मंच बन जाए, तो संस्कृति भीड़ में खोने लगती है।

🔥 हुड़दंग कब हद पार करता है?

होली में धक्का लगेगा — मान लिया। मजाक होगा — ठीक है। रंग जबरन लगेगा — परंपरा कह दी जाएगी।

लेकिन जब लड़की का चेहरा डर से सख्त हो जाए… जब वो भीड़ से निकलने का रास्ता ढूंढे… जब सहेलियां उसे घेरे खड़ी हो जाएं… तब समझिए कि रंग नहीं, हालात बिगड़ रहे हैं।

🕉️ आखिर में… संस्कृति की असली परीक्षा

बरसाना की होली सिर्फ लाठी और रंग नहीं है। वो प्रेम की परंपरा है। नारी-शक्ति का प्रतीक है।

अगर उसी होली में कोई बेटी खुद को बचाने की कोशिश करे, तो दोष त्योहार का नहीं — दोष उस सोच का है जो रंग में भी शरीर तलाशती है।

त्योहार बचाना है… तो मर्यादा बचानी होगी। क्योंकि संस्कृति शोर से नहीं, व्यवहार से जीवित रहती है।
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