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आज होलिका तो जलती है लेकिन बुराई नहीं?

कितना अजीब है न, , ,!

हम हर साल होली मनाते हैं और रटी रटाई बातें दोहराते हैं लेकिन फर्क कुछ नहीं पड़ता! बुराई पर अच्छाई की जीत और अधर्म पर धर्म की जीत , , और ना जाने क्या क्या!

लेकिन सोचो हर साल नशा बढ़ता जाता है? हर साल हत्या, मॉब लॉचिंग और बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जाती हैं और हम हर साल होली मनाते हैं!

एक तरफ धर्म,जाती,समुदाय के नाम पर हिंसा होती है और बातें तो भाईचारे की होती है, , !

एक तरफ गुलाल देकर गले मिलते हैं और पीठ पीछे मौका चूक जाने के अफसोस पर हाथ मलते हैं!

काला बाजारी,मिलावटखोरी सब चलता रहता है और हर साल होलिका का बस पुतला जलता रहता है!

और हम संतोष कर लेते हैं कि देखो बुराई जल गई…!

कहाँ जली है बुराई?

वो तो हमारे व्यवहार में जिंदा है,
हमारी भाषा में जिंदा है,
हमारी सोच में जिंदा है!

हम दूसरों की होलिका जलाने निकलते हैं
लेकिन अपने अंदर की आग को कभी नहीं देखते!

हमें दूसरों की गलतियाँ दिखाई देती हैं
लेकिन अपनी सुविधा का धर्म हमें अंधा कर देता है!

त्योहार आते हैं,
हम फोटो खिंचवाते हैं,
स्टेटस लगाते हैं – *“बुराई पर अच्छाई की जीत”*
और अगले ही दिन फिर वही छल, वही कपट, वही नफरत!

सच तो ये है कि
होलिका जलाना आसान है,
अहंकार जलाना मुश्किल है!

पुतला जलाना आसान है,
आदतें बदलना मुश्किल है!

शायद इसलिए हर साल आग तो जलती है…
लेकिन बुराई नहीं।

इस बार अगर सच में होली मनानी है
तो लकड़ियों से पहले
अपने भीतर की एक बुराई चुनकर जलाओ…

वरना अगली होली पर भी
हम यही पूछते रहेंगे —
*आज होलिका तो जली… लेकिन बुराई क्यों नहीं?*

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