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।। व्यंग्य।।

सांकेतिक चित्र 

रातिकरार कला के शेख चिल्ली?:बुरा न मानो होली है!:करेली: नरसिंहपुर

दस लाख का भूसा खिलाया फिर भी दस रुपए का गोबर नहीं मिला?

नहीं , , मतलब हंसने की बात नहीं है ये, , सवाल थोड़ा अजीब महसूस हो सकता है लेकिन बात तो सही भी लगती है!

भाई जब ग्राम पंचायत नौ महीने में नब्बे ट्राली भूसा खरीद दिखाए और 5000 रु प्रति ट्राली की दर से साढ़े चार लाख रुपए से अधिक का भुगतान किया जाए तब विकास की एक उम्मीद तो जागी होगी ग्रामीणों के मन में, , की अब तो गौ शाला में गाएं खूब खाएंगी और फिर गोबर प्राप्त होगा, ,उस गोबर से कंडे और गौ काष्ठ का निर्माण होगा, , पंचायत में दो पैसा ज्यादा आयेगा तो गांव के विकास में चार पंख और लग जाएंगे, , लेकिन ये क्या, , ,?

इतना भूसा खाने के बाद भी सारे सपने अधूरे रह गए!

अब गांव वाले भी सोच में हैं, , कि भूसा गया कहां?

गौशाला में गाएं हैं या सिर्फ कागजों में?
गोबर धरती पर गिरा या सीधे फाइलों में सूख गया?

क्योंकि हिसाब किताब तो कह रहा है कि गाएं नौ महीने तक “पांच सितारा होटल” में रहीं, , लेकिन जमीन पर ना कंडे दिखे, , ना गौ काष्ठ की खुशबू आई, , और ना ही पंचायत की आमदनी में कोई हरियाली नजर आई।

कहीं ऐसा तो नहीं कि भूसा इतना “आध्यात्मिक” था कि गायों ने उसे ध्यान लगाकर आत्मसात कर लिया और गोबर बनने की जहमत ही नहीं उठाई?
या फिर गोबर भी आजकल डिजिटल हो गया है, , सीधे एक्सेल शीट में एंट्री होकर अदृश्य हो जाता है?

ग्रामीणों का सवाल सीधा है, ,
अगर भूसा आया था तो खाया किसने?
अगर खाया था तो गोबर कहां है?
और अगर गोबर नहीं है, , तो फिर ये पूरा गणित किस खेत की मूली है?

होली का मौसम है, , रंग उड़ रहे हैं, , और गांव वाले भी पूछ रहे हैं —
कहीं ये “भूसा कांड” भी रंगों की आड़ में धुल तो नहीं जाएगा?

क्योंकि यहां तो हाल ये है कि
भूसा कागजों में मोटा होता गया,
और हकीकत में गौशाला पतली।

कहने को तो विकास की गाड़ी दौड़ रही है, ,
लेकिन पहिए कागज पर घूम रहे हैं और धूल गांव की आंखों में उड़ रही है।

अब शेख चिल्ली जैसे सपने देखने वाले ग्रामीण भी सोच रहे हैं —
क्या हम ही ज्यादा उम्मीद कर बैठे थे?
या फिर उम्मीदों का भी टेंडर निकल चुका है?

बुरा न मानो होली है!
पर सवाल तो फिर भी रहेगा —
दस लाख का भूसा गया किधर, , और दस रुपए का गोबर भी क्यों नहीं मिला?

रंगों के बाद जब पानी उतरेगा, ,
तो शायद असली रंग भी दिखेंगे।

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