प्रशासन को गुमराह करने का प्रयास?: ग्राम पंचायत केरपानी
वैसे तो पंचायतों में छोटे-मोटे गोलमाल की घटनाएं अब सामान्य बात मानी जाती हैं, लेकिन मामला तब गंभीर हो जाता है जब दस्तावेज़ों में सुनियोजित तिकड़म साफ दिखाई देने लगे। कागज़ों में कुछ और, अपलोड प्रविष्टि में कुछ और और ज़मीनी सच्चाई बिल्कुल अलग — यही तस्वीर ग्राम पंचायत केरपानी में सामने आ रही है।
बिल में नाम का खेल?
आखिर असली सप्लायर कौन है — स्टेशनरी की दुकान या इलेक्ट्रॉनिक्स विक्रेता?
बिल पर दर्ज विवरण के मुताबिक “संदीप इलेक्ट्रिकल्स एंड जनरल स्टोर्स” LED TV, इलेक्ट्रॉनिक कांटे व अन्य सामग्री के विक्रेता बताए गए हैं। तो फिर इन्हें लघु दुकानदार की श्रेणी में क्यों दर्शाया गया? क्या यह श्रेणी विशेष लाभ लेने के लिए बदली गई? या भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए दस्तावेज़ों में हेरफेर किया गया?
जीएसटी नंबर क्यों गायब?
सबसे गंभीर पहलू यह है कि बिल पर नियमानुसार जीएसटी नंबर अंकित होना चाहिए। यदि कारोबार पंजीकृत है तो जीएसटी अनिवार्य है, और यदि नहीं है तो फिर इतनी बड़ी राशि का लेनदेन किस आधार पर किया गया?
क्या टैक्स बचाने के लिए गलत जानकारी दर्ज कर शासन के राजस्व को नुकसान पहुंचाया जा रहा है?
सरकारी योजनाओं की राशि गांव के विकास के लिए आती है, लेकिन यदि बिलों की प्रविष्टियों में ही गड़बड़ी हो तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं कुछ छुपाने की कोशिश की जा रही है। सवाल यह भी है कि बिल अपलोड करते समय संबंधित अधिकारी ने दस्तावेज़ों का मिलान क्यों नहीं किया? क्या यह लापरवाही है या मिलीभगत?
जवाबदेही तय होगी?
यदि एक ही बिल में दुकानदार का नाम बदल रहा है, श्रेणी बदल रही है और कर संबंधी जानकारी गायब है, तो यह सामान्य त्रुटि नहीं कही जा सकती। यह प्रशासन को गुमराह करने का सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।
गांव की जनता जानना चाहती है — क्या विकास के नाम पर दस्तावेज़ों का यह खेल चलता रहेगा या फिर सच्चाई सामने आएगी?
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या जांच बैठाई जाएगी? क्या संबंधित बिलों का ऑडिट होगा? या फिर यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह धूल फांकता रह जाएगा?


