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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

ग्राम पंचायत आमगांव में छिपाई जा रही सूचना अधिकार अधिनियम अंतर्गत मांगी गई जानकारी?

🔎 आखिर क्या वजह है?

आखिर क्या वजह है कि RTI फार्म विधिवत प्राप्त हो जाने के बाद भी पंचायत आवेदनकर्ता से संपर्क नहीं कर पाई? या यूँ कहें… संपर्क करना चाहा ही नहीं?

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 कोई सजावटी किताब नहीं है, जिसे अलमारी में रखकर साल में एक बार झाड़ लिया जाए।

यह कानून इसलिए बना था कि जनता अपने पैसे, अपनी योजनाओं और अपने अधिकारों का हिसाब पूछ सके। लेकिन आमगांव में लगता है कि “सूचना” शब्द से ही कुछ लोगों को एलर्जी है।

⏳ समय सीमा भी बेअसर?

RTI आवेदन पहुंच गया। रसीद मिल गई। समय सीमा भी बीतने लगी। पर पंचायत की घड़ी शायद किसी और कैलेंडर पर चल रही है।

  • क्या आवेदनकर्ता का मोबाइल नंबर खो गया?
  • क्या फाइल रास्ते में भटक गई?
  • या फिर जानकारी इतनी “संवेदनशील” है कि उसे उजाले से डर लग रहा है?

कानून साफ कहता है कि 30 दिनों के भीतर जानकारी देना अनिवार्य है। लेकिन जब जवाब देने की मंशा ही न हो, तो समय सीमा सिर्फ एक सुझाव बनकर रह जाती है।

अगर सब कुछ पारदर्शी है, तो जानकारी देने में हिचक क्यों? और अगर जानकारी देने में हिचक है, तो पारदर्शिता का दावा क्यों?

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