जब धर्म बना सियासत का हथियार…
कुछ पुराने शायरों और संत कवियों की वो पंक्तियाँ, जो इंसान को दो पल रुककर सोचने पर मजबूर कर दें।
अकबर इलाहाबादी
खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो।
अकबर इलाहाबादी
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।
मिर्ज़ा ग़ालिब
काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’,
शर्म तुमको मगर नहीं आती।
कबीर
पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़,
ताते तो चाकी भली, पीस खाए संसार।
कबीर
काजी मुल्ला लड़ि मुए, लड़ि मुए दरवेश,
दोउ जगत के फंद में, कोई न पाया भेद।
इक़बाल
जुदा हो दीन सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी।
अकबर इलाहाबादी
दीन में भी हैं सियासत के कई दरवाज़े,
मंदिरों-मस्जिदों में भी सियासत देखी।
मिर्ज़ा ग़ालिब
इमाँ मुझे रोके है, जो खींचे है मुझे कुफ़्र,
काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे।
कबीर
हिंदू कहे मोहि राम पियारा, तुरक कहे रहमान,
आपस में दोउ लड़े मरि जाते, मरम न कोई जान।
अकबर इलाहाबादी
तालीम का शोर है, तहज़ीब का नाम है,
मंदिर भी है, मस्जिद भी है — इंसान कहाँ है?
सवाल यही है…
धर्म अगर इंसान को जोड़े तो आस्था है,
और अगर बाँटे — तो क्या वह सिर्फ सत्ता की चाल है?
धर्म अगर इंसान को जोड़े तो आस्था है,
और अगर बाँटे — तो क्या वह सिर्फ सत्ता की चाल है?
© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी.
