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Stringer24News

लेखक पत्रकार:विक्रम सिंह राजपूत 

धर्म के नाम पर दादागिरी? देश भीड़ से नहीं, कानून से चलेगा!

गांव की चौपाल पर बैठकर अगर आजकल की खबरें पढ़ लो तो माथा ठनक जाता है। कहीं जुलूस में तलवार लहर रही है, कहीं पोस्ट पर लड़ाई, कहीं नारे से आग भड़क रही है। और हर बार नाम जुड़ जाता है — “हिंदू संगठन”।

सवाल सीधा है — धर्म बच रहा है या कानून टूट रहा है?

हमारे यहां धर्म का मतलब क्या था? संयम, सेवा, सहनशीलता और मर्यादा। राम का नाम लेने वाला अगर सड़क पर कानून तोड़ने लगे, तो यह रामराज्य है या गुंडाराज?

संविधान सर्वोपरि है

आज जो तस्वीर उभर रही है, वह बेहद चिंताजनक है।

किसी फिल्म के विरोध में सड़क जाम, किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर मारपीट, किसी छोटे से विवाद को सांप्रदायिक रंग देकर माहौल बिगाड़ देना — यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है। अगर हर संगठन स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगे तो फिर प्रशासन किसलिए है?

यह देश मंदिर-मस्जिद से पहले संविधान से चलता है। अगर हर संगठन अपने 20-50 लड़कों को इकट्ठा करके सड़क पर उतर आए और फैसला खुद करने लगे, तो फिर थाने किसलिए हैं? अदालत किसलिए है?

गांव का आदमी सीधी बात समझता है — अगर खेत की मेड़ कोई तोड़ेगा तो पंचायत बैठेगी, फैसला होगा। पर यहां तो बिना पंचायत, बिना कानून, सीधे लाठी!

धर्म के नाम पर उग्रता दिखाने से धर्म बड़ा नहीं होता, बदनाम होता है।

प्रशासन की चुप्पी भी सवालों में

गलती किसी भी धर्म के संगठन की हो, गलत तो गलत है। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। अगर प्रशासन चुप बैठा रहेगा, तो चुप्पी भी अपराध बन जाएगी।

आज गांव-गांव में लोग पूछ रहे हैं — क्या देश संविधान से चलेगा या भीड़ के मूड से?

  • विरोध करना अधिकार है।
  • लेकिन हिंसा करना अपराध है।
  • नारा लगाना लोकतंत्र है।
  • लेकिन किसी को डराना लोकतंत्र नहीं है।

धर्म अगर राजनीति का हथियार बन गया, तो सबसे पहले धर्म ही घायल होगा। और अगर कानून कमजोर पड़ा, तो कल यही आग हर घर तक पहुंचेगी।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि प्रशासन की भूमिका क्या है?

अगर किसी भी संगठन को बार-बार कानून तोड़ने की छूट मिलती है, तो यह संदेश जाता है कि कानून सबके लिए समान नहीं है। और जब कानून का भय समाप्त हो जाता है, तब अराजकता जन्म लेती है।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है —

लेकिन हिंसा का नहीं।

आक्रोश की अभिव्यक्ति का अधिकार है —

लेकिन दूसरे के अधिकारों को कुचलने का नहीं।

आज जरूरत है आत्ममंथन की।

हिंदू संगठन हों या किसी अन्य धर्म के संगठन — यदि वे समाज में शांति, सेवा और संस्कार का काम करें तो उनका स्वागत है। लेकिन यदि वे सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन और टकराव की राजनीति को बढ़ावा देंगे, तो यह देश को पीछे धकेलेगा।

भारत की असली ताकत विविधता में एकता है, न कि टकराव में लोकप्रियता।

देश किसी संगठन की ताकत से नहीं, संविधान की ताकत से चलता है। जो भी कानून तोड़ेगा — कार्रवाई होनी चाहिए।
© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी.
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