भगवान बनने की चाह?
या जनता को मूर्ख बनाने का संगठित धंधा?
आज फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम खोलिए — भगवान ढूँढने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। भगवान खुद लाइव आ जाते हैं। कोई दावा करता है कि उस पर देवी आ गई है, कोई खुद को अवतार बताता है, और कुछ लोग अजीब–अजीब भावभंगिमाएं बनाकर भीड़ से आस्था नहीं, अंधविश्वास वसूल रहे हैं।
दैवीय आगमन या निर्लज्ज तमाशा?
सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक वीडियो मौजूद हैं, जहाँ कुछ लड़के/ लड़कियाँ अजीबो-गरीब मुद्राओं में नृत्य करती दिखाई देती हैं और इसे पूरे आत्मविश्वास के साथ “दैवीय आगमन” बताया जाता है।
कुछ वीडियो में वेशभूषा ऐसी है कि देखने वाला खुद शर्मिंदा हो जाए। कोई बंदरों की तरह उछल-कूद कर रहा है, कोई कुत्ते जैसी चाल में ज़मीन सूंघता फिर रहा है, तो कोई भैंस की तरह जुगाली करता हुआ मुंह से कुछ चबाकर थूकता है और उसे “प्रसाद” बताकर लोगों में बाँट देता है।
यह सब खुलेआम, बिना किसी झिझक के — धर्म के नाम पर किया जा रहा है।
क्या यही है सनातन हिन्दू धर्म?
क्या यही वह सनातन है जिसने उपनिषद दिए, जिसने तर्क, विवेक और आत्मबोध की परंपरा सिखाई? या फिर आज सनातन इतना सस्ता हो गया है कि कोई भी मोबाइल उठाए, आंखें पलटाए, शरीर मरोड़े और ऐलान कर दे —
“मुझ पर भगवान आ गए हैं!”
एक तरफ दुनिया, दूसरी तरफ हम
एक तरफ विदेशी युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्पेस टेक्नोलॉजी और भविष्य की खोज में लगे हैं।
और दूसरी तरफ हमारे यहाँ यह बहस चल रही है कि आज किस पर कौन-सी देवी आई है। यह धर्म नहीं, यह सोच की हार है।
यह आस्था नहीं, राष्ट्रीय शर्म है
भगवान कभी कैमरे के सामने नाचते नहीं। भगवान लाइक, शेयर और सब्सक्राइबर नहीं माँगते। जो खुद को भगवान कहता है, वह अक्सर जनता को मूर्ख समझ रहा होता है।
भगवान सवालों से नहीं डरते, डरते हैं सिर्फ ठग।
शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो इस तमाशे को धर्म का नाम दे रहे हैं। और अगर समाज अब भी चुप है, तो मान लेना चाहिए — यहाँ भगवान नहीं, धंधा जीत चुका है।
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