पत्रकारिता भूखी रहेगी तो सच कौन लिखेगा?
एक अनुमान के मुताबिक भारत में इस समय लगभग 57 लाख (5.7 मिलियन) वेबसाइटें दर्ज हैं। यह आंकड़ा केवल डिजिटल विस्तार का नहीं, बल्कि उन लाखों लेखकों, संपादकों और स्वतंत्र पत्रकारों का भी है, जो शब्दों के सहारे लोकतंत्र को ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन तस्वीर तेज़ी से बदल रही है। पारंपरिक समाचार वेबसाइटों की जगह अब “बाइट-साइज़” खबरों ने ले ली है। टिकटॉक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सूचना के नए केंद्र बन चुके हैं।
2025–26 के आंकड़े और मीडिया रिपोर्ट्स साफ संकेत देते हैं— अब पाठक नहीं, स्क्रॉलर पैदा हो चुका है।
रील्स के बढ़ते चलन के बाद कई छोटे डिजिटल मीडिया संस्थानों और ब्लॉगर्स ने अपनी वेबसाइटों का रखरखाव छोड़ दिया। वे अब रिपोर्टर नहीं, एल्गोरिद्म के मजदूर बनते जा रहे हैं!
वेबसाइटें आज भी भरोसेमंद खबरों का माध्यम हैं, लेकिन उनकी पहुंच अब गंभीर रिसर्च और विस्तृत रिपोर्टिंग तक सीमित हो गई है। ट्रेंडिंग खबरों के लिए आम पाठक सीधे सोशल मीडिया फीड्स का सहारा ले रहा है।
2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी समाचार प्रकाशकों के वेब ट्रैफिक में 10% से 35% तक की गिरावट दर्ज की गई।
राहत की बात सिर्फ इतनी है कि विश्वसनीयता के मामले में आज भी आधिकारिक न्यूज़ वेबसाइटें रील्स से आगे हैं। क्योंकि वेबसाइटों के पीछे संपादकीय टीम होती है, कानूनी जवाबदेही होती है।भले ही रील्स सूचना पाने का सबसे तेज़ और लोकप्रिय ज़रिया बन गई हैं, लेकिन गहराई और प्रामाणिकता के लिए लोग आज भी वेबसाइटों पर ही भरोसा करते हैं।
जबकि रील्स पर कोई भी व्यक्ति बिना प्रमाण, बिना संदर्भ और बिना जिम्मेदारी के सूचना के नाम पर कुछ भी परोस सकता है। 60–90 सेकंड की वीडियो में सच अक्सर क्लिकबेट की बलि चढ़ जाता है।
आज रील्स और शॉर्ट फॉर्म कंटेंट ट्रेंड में हैं—इससे इनकार नहीं। लेकिन वेबसाइटें आज भी इतिहास का पहला ड्राफ्ट लिख रही हैं। सवाल यह नहीं कि रील्स लोकप्रिय हैं, सवाल यह है कि
अगर पत्रकारिता भूखी रहेगी, तो कल सच लिखने की ताकत किसके पास बचेगी?
