बेदू को कर रहे कलंकित? : गबन में रच रहे इतिहास!
विकास की आड़ में बेदू की इज्जत का सौदा?
🔴 यह सिर्फ गबन नहीं, यह विश्वासघात है
बेदू की मिट्टी ने मेहनतकश लोगों को जन्म दिया है, लेकिन आज उसी मिट्टी पर कुछ लोगों ने लालच का महल खड़ा कर दिया है।
जनता का पैसा अगर जेब में गया है — तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, यह नैतिक दिवालियापन है।
योजनाएं आईं… बजट आया… भुगतान हुआ… लेकिन काम? जमीन पर हकीकत देखकर लगता है जैसे विकास नहीं, सिर्फ दस्तावेजों में अभिनय हुआ हो।
🔴 कागज़ चमक रहे हैं, गांव क्यों नहीं?
फाइलों में सब कुछ “पूर्ण” है। रिपोर्ट में सब कुछ “संतोषजनक” है। लेकिन बेदू की गलियां पूछ रही हैं — अगर पैसा लगा है तो निशान कहां हैं?
गबन जब व्यवस्था बन जाए, तो चुप रहना भी अपराध बन जाता है।
🔴 सवालों से डर क्यों?
अगर सब कुछ साफ है तो जांच से डर कैसा? अगर हाथ पाक हैं तो पारदर्शिता से घबराहट क्यों?
बेदू बदनाम हो रहा है… और कुछ चेहरे ऐसे घूम रहे हैं जैसे उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता। याद रखिए — गांव की बदनामी सिर्फ एक खबर नहीं होती, वह पीढ़ियों तक लगने वाला दाग होती है।
इतिहास दो ही तरह से याद रखता है — या तो ईमानदारों को, या फिर लुटेरों को।
🔴 अब फैसला जनता के हाथ में है
बेदू को कलंकित करने वालों के चेहरे बेनकाब होंगे या नहीं — यह आने वाला वक्त तय करेगा। लेकिन एक बात साफ है — जब जनता जागती है, तो कुर्सियां हिलती हैं।
