नेता… रेत चुराकर भाषण देता!
गांव की नदी अब नदी नहीं रही। वो एक जख्म है — सूखा हुआ, फटा हुआ, छलनी हुआ जख्म। जहां कभी बच्चे नहाते थे, किसान बैलगाड़ी उतारते थे, वहीं आज गड्ढे हैं और खामोशी है। लेकिन चौपाल में माइक चीख रहा है — “हम विकास की नई इबारत लिख रहे हैं!”
🏜️ विकास की खुदाई
नेता जी के भाषण में विकास ऐसे दौड़ता है जैसे हर घर में समृद्धि पहुंच गई हो। पर सच्चाई ये है कि समृद्धि सिर्फ डंपर तक पहुंची है। दिन में सफेद कुर्ता, रात में रेत से लदा काफिला।
गांव की नदी का पेट खाली है। जैसे किसी ने उसका कंकाल निकाल लिया हो। लेकिन नेता जी का पेट? वो तो विकास से लबालब भरा है।
“आज पांच ट्रिप और निकलवा दो… ऊपर तक सेटिंग है।”
ऊपर कौन? नीचे कौन? सब जानते हैं। पर सब चुप हैं।
🎤 मंच का मसीहा, नदी का कसाई
मंच पर खड़े होकर नेता गरजते हैं — “हमारे रहते कोई अवैध खनन नहीं होगा!” और पीछे से उनका ही ट्रैक्टर रेत से झुका हुआ गुजरता है। गांव वाला पूछता है —
“साहब, ये क्या है?”
नेता हंसकर कहते हैं —
“ये रोजगार है!”
रोजगार? या रिश्तेदारों का कारोबार?
नेता कहते हैं — “हम पर्यावरण बचाएंगे!” और उसी समय नदी का पेट JCB से फाड़ा जा रहा होता है। पानी सूखता है, कुएं नीचे जाते हैं, फसलें कमजोर होती हैं। पर भाषण और मजबूत होता जाता है।
मातृभूमि की सेवा के नाम पर, मां का गहना भी बेच दिया गया।
💰 रेत का गणित
एक ट्रिप… दो ट्रिप… दस ट्रिप… रात भर डंपर चलते हैं। सुबह खबर आती है — “साहब ने नई गाड़ी ले ली…” गाड़ी विकास की, बंगला विकास का, प्लॉट विकास का। नदी? उसे पिछड़ेपन की निशानी घोषित कर दिया गया।
🧾 कानून की जेब में रेत
कागजों में सब वैध है। रॉयल्टी जमा, अनुमति स्वीकृत, निरीक्षण संतोषजनक। बस नदी से पूछ लो कि संतोष किसका हुआ?
“ये मामला ऊपर का है…”
🐍 जनता की चुप्पी
गांव का आदमी सब जानता है। पर उसका बेटा नौकरी मांगने जाएगा तो उसी दरवाजे जाएगा। इसलिए वह ताली बजाता है, जयकारा लगाता है, और घर जाकर कहता है — “क्या करें, सिस्टम ऐसा है…”
🌊 नदी का शाप
आज रेत गई है। कल पानी जाएगा। परसों किसान जाएगा। फिर गांव खाली होगा। और चुनावी मंच से फिर वही आवाज आएगी — “हमने ऐतिहासिक विकास किया है!”
नेता बदलते हैं, नारे बदलते हैं… पर रात का डंपर कभी नहीं बदलता।
