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एप्स्टीन फाइल्स और भारत: दावों का धुआँ या सियासत की आग?

अमेरिका में दिवंगत अपराधी जेफरी एप्स्टीन से जुड़ी फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद दुनिया भर में हलचल मची हुई है। पहले चर्चा केवल हॉलीवुड और अमेरिकी नेताओं तक सीमित थी, लेकिन अब कुछ दस्तावेजों में भारत से जुड़े संदर्भों के सामने आने के बाद देश में भी राजनीतिक तापमान बढ़ गया है।

सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ स्टूडियो तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या इन फाइलों में दर्ज दावे महज एक अपराधी की कल्पना हैं या फिर इनके पीछे कोई ठोस सच्चाई छिपी है? 

इंटरनेट पर मौजूद कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक :


भारत का नाम कैसे जुड़ा?

अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेजों में एप्स्टीन के निजी ईमेल, संपर्कों और नोट्स शामिल बताए जा रहे हैं। इन ईमेल में उसने कई वैश्विक नेताओं और उद्योगपतियों से अपने संबंधों का दावा किया है। इन्हीं कथित ईमेल में भारत से जुड़े कुछ संदर्भ सामने आने का दावा किया गया, जिसके बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई।


प्रधानमंत्री से जुड़ा दावा क्या है?

सबसे बड़ा विवाद एक कथित ईमेल को लेकर है, जिसमें एप्स्टीन ने दावा किया कि 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक इजरायल यात्रा के पीछे उसकी सलाह थी।

दावा यह भी किया गया कि उसने अमेरिका-भारत संबंधों को लेकर परामर्श दिया था।

हालांकि इन दावों की कोई स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है।


क्या अन्य भारतीय नाम भी सामने आए?

कुछ रिपोर्ट्स में उद्योगपति अनिल अंबानी और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के नामों का उल्लेख होने की बात कही गई है। ईमेल में कथित तौर पर निवेश, प्रतिनिधिमंडल यात्राओं और संपर्क स्थापित करने जैसे विषयों का जिक्र बताया जा रहा है।

हालांकि केवल किसी ईमेल में नाम का उल्लेख होना किसी औपचारिक या प्रत्यक्ष संबंध का प्रमाण नहीं माना जा सकता।


भारत सरकार का क्या कहना है?

भारत सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि एक सजायाफ्ता अपराधी के निजी ईमेल को आधिकारिक कूटनीतिक निर्णयों से जोड़ना निराधार और हास्यास्पद है।

सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा पूरी तरह से रणनीतिक और संस्थागत निर्णय था।

क्या ये दावे विश्वसनीय हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि एप्स्टीन स्वयं को एक वैश्विक नेटवर्कर और प्रभावशाली सलाहकार के रूप में प्रस्तुत करता था। उसके ईमेल में बड़े नामों का उल्लेख होना जरूरी नहीं कि उन व्यक्तियों की वास्तविक भागीदारी को दर्शाता हो।

फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी केवल निजी ईमेल दावों तक सीमित है। जब तक स्वतंत्र जांच या ठोस प्रमाण सामने नहीं आते, किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।


निष्कर्ष

एप्स्टीन फाइल्स ने एक नया वैश्विक विवाद जरूर खड़ा कर दिया है। भारत से जुड़े दावों ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है, लेकिन अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ये दावे केवल एक अपराधी की बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई कहानी थे या फिर इनके पीछे कोई ठोस तथ्य सामने आते हैं।

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