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🏥 जिले की स्वास्थ्य सेवाएं “बंगाली डॉक्टरों” के भरोसे?

क्या सरकारी तंत्र ने ग्रामीणों को किस्मत के हवाले कर दिया है?

जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों की सच्चाई अगर आंखें खोलकर देखी जाए, तो तस्वीर बेहद असहज कर देने वाली है। कागजों में अस्पताल, योजनाओं में करोड़ों का बजट, भाषणों में “बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं” — लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है।

गांव-गांव, गली-गली, चौपाल से लेकर हाट-बाजार तक “बंगाली डॉक्टरों” के बोर्ड टंगे हैं। सवाल यह है कि जब हर मोड़ पर एक तथाकथित डॉक्टर उपलब्ध है, तो फिर सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आखिर हैं कहां?

क्या यह मान लिया जाए कि जिले की स्वास्थ्य सेवाएं अब आधिकारिक तौर पर अनौपचारिक हाथों में सौंप दी गई हैं?

  • क्या स्वास्थ्य विभाग को इन क्लीनिकों की जानकारी नहीं?
  • या जानकारी है, लेकिन आंखों पर पट्टी बांध ली गई है?
  • क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों और प्रेस नोट तक सीमित है?

ग्रामीण अंचलों में जितने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं, उससे कहीं अधिक इंजेक्शन-ड्रिप चढ़ाने वाले “विशेषज्ञ” मौजूद हैं। बिना डिग्री, बिना रजिस्ट्रेशन, बिना जवाबदेही — लेकिन आत्मविश्वास ऐसा कि बड़े-बड़े एमबीबीएस डॉक्टर भी शरमा जाएं!

जब प्रसव के दौरान जटिलता होती है और मां-बच्चे की जान जोखिम में पड़ती है, तब जिम्मेदार कौन?
  • जब गलत इंजेक्शन से रिएक्शन हो जाए, तो एफआईआर किस पर?
  • जब झोलाछाप के इलाज से मौत हो जाए, तो फाइल किस अलमारी में दबा दी जाती है?
  • क्या गरीब की जिंदगी इतनी सस्ती है?

सरकार “मुफ्त इलाज” और “बेहतर स्वास्थ्य सेवा” के दावे करती है, लेकिन जमीनी हालात बताते हैं कि ग्रामीण जनता 200-300 रुपये में जिंदगी का जुआ खेलने को मजबूर है।

क्या डॉक्टरों की पदस्थापना सिर्फ शहरों तक सीमित है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों में पोस्टिंग सजा मानी जाती है?

स्वास्थ्य विभाग कभी-कभार अभियान चलाता है। दो-चार क्लीनिक सील, कुछ तस्वीरें, एक प्रेस विज्ञप्ति — और फिर सब कुछ सामान्य। क्या यह कार्रवाई है या औपचारिकता?

ग्रामीणों से पूछिए — उन्हें डिग्री से ज्यादा राहत चाहिए। उन्हें नामी अस्पताल नहीं, समय पर इलाज चाहिए। लेकिन क्या व्यवस्था की नाकामी का बोझ गरीब की जान से चुकाया जाएगा?

अगर ये तथाकथित “बंगाली डॉक्टर” इतने ही सक्षम हैं, तो क्या स्वास्थ्य विभाग इन्हें आधिकारिक मान्यता देने जा रहा है? या फिर यह स्वीकार कर लिया जाए कि असली सिस्टम फेल हो चुका है?

जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर यह सवाल सिर्फ तंज नहीं, चेतावनी है। क्योंकि जब सिस्टम सोता है, तो सबसे पहले गरीब की सांस रुकती है।

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