सड़क किनारे खुले गड्ढे!
यह लापरवाही नहीं, आम जनता के खिलाफ अपराध है!
सड़क किनारे खुले पड़े गड्ढे अब खतरे की चेतावनी नहीं रहे — ये सीधे मौत का खुला निमंत्रण बन चुके हैं। यह किसी तकनीकी भूल या साधारण चूक का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की वह तस्वीर है जिसमें आम आदमी की जान सबसे सस्ती मानी जा रही है।
सवाल यह नहीं कि गड्ढे क्यों खुले हैं, सवाल यह है कि इन्हें खुला छोड़ने की हिम्मत किसने दी?
इन गड्ढों के ठीक बगल से हर दिन स्कूली बच्चे, मजदूर, महिलाएं, बुज़ुर्ग और दुपहिया वाहन चालक गुजरते हैं। एक हल्की फिसलन, एक गलत कदम और ज़िंदगी हमेशा के लिए खत्म।
न चेतावनी बोर्ड, न बैरिकेडिंग, न लाल झंडी, न सुरक्षा संकेत — बस प्रशासन की खामोशी और मौत का इंतजार।
इस सिस्टम में पहले हादसा होता है, फिर अफसर जागते हैं। पहले लाश गिरती है, फिर फाइल चलती है।
क्या किसी बच्चे के गिरने के बाद गड्ढा भरा जाएगा? क्या किसी मां की गोद उजड़ने के बाद विभाग हरकत में आएगा?
अगर कल यहां हादसा होता है, तो उसे “दुर्घटना” नहीं कहा जाएगा — वह प्रशासन की पूर्व-घोषित हत्या होगी।
यह विकास नहीं, यह जनता की जान से खेल है। और अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो हर संभावित हादसे की सीधी जिम्मेदारी संबंधित विभाग और अधिकारियों की होगी।
या तो गड्ढे भरो — या जवाबदेही तय करो!
