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📰 Stringer24News | विशेष रिपोर्ट

नरसिंहपुर जिले में पत्रकारिता.........?

यह एक सवाल है जिसे कई मायनों में देखा जा सकता है! मसलन — जिले में पत्रकारिता की क्या स्थिति है? पत्रकार किस तरह के हालातों का सामना कर रहे हैं? सबसे अहम सवाल — असली पत्रकार कौन है, फर्जी पत्रकार कौन और जिले में आखिर कितने पत्रकार हैं? क्या पत्रकार वसूली में भी लिप्त रहते हैं?

तो आइए Stringer24 News के साथ हम इन सवालों के जवाब खोजते हैं!

जिले में पत्रकारिता की स्थिति

जिले में पत्रकारिता की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती है। जिस तरह बीते कुछ सालों में पत्रकारों के साथ मारपीट की घटनाएं और उन्हें झूठे मुक़दमे में फंसाए जाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं, इससे यह बात तो तय है कि, पत्रकारों पर अंकुश लगाए जाने के प्रयास तो किए जाते हैं।

क्षेत्रवार पत्रकारिता की तस्वीर

आप देखिए ऐसा प्रतीत होता है जैसे — गोटेगांव क्षेत्र में पत्रकारिता बहुत ही खामोश दिखाई देती है!खबरों के नाम पर गोटेगांव क्षेत्र से अधिकतर प्रेस विज्ञप्तियां ही पढ़ने को मिल रही हैं? कोई सवाल नहीं, कोई आलोचना नहीं ?

इसके विपरीत आप सालीचौका, गाडरवारा और करेली में काफी हद तक बदलाव देख सकते हैं! जबकि चांवरपाठा क्षेत्र में भी पत्रकारिता की इस खामोशी को महसूस किया जा सकता है!

पत्रकार किन हालातों का सामना कर रहे हैं?

सबसे पहले आपको नरसिंहपुर में पत्रकारों के इस त्रिस्तरीय आयाम को समझना होगा।

पहली श्रेणी — वो पत्रकार जो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से हैं। इनकी तादाद गिनी-चुनी है और बड़े संस्थानों से जुड़ाव के कारण स्थिति ठीक-ठाक है। ऐसे पत्रकारों की संख्या लगभग दस से पंद्रह हो सकती है — फिलहाल यह एक अनुमान है।

दूसरी श्रेणी — वो पत्रकार जो किसी प्रिंट मीडिया संस्थान से छोटी एजेंसी लेकर काम कर रहे हैं। इनकी तादाद सर्वाधिक है, क्योंकि प्रिंट मीडिया संस्थानों से जुड़ने की प्रक्रिया आसान है। 2500 से 5000 रुपये देकर सदस्यता लेकर भी काम किया जा सकता है।

तीसरी श्रेणी — डिजिटल मीडिया के पत्रकार। इनकी तादाद भी काफी है, लेकिन सक्रिय बेहद कम। नरसिंहपुर जिले में बहुत ही कम न्यूज मीडिया वेबसाइट्स हैं जिनका नियमित और सुचारू संचालन किया जा रहा है।

कई बार यह भी देखने में आता है कि कुछ वेबसाइट्स सिर्फ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आसपास ही सक्रिय दिखाई देती हैं।

छोटे मीडिया संस्थान से सदस्यता कार्ड लेकर काम करने वाले पत्रकार और डिजिटल मीडिया पत्रकारों की स्थिति मिलजुली है। यहां यह भी देखने को मिलता है कि कुछ लोग पत्रकारिता को पार्ट टाइम जॉब की तरह भी करते हैं — जिसकी वजह पत्रकारिता में आर्थिक संकट है।

सबसे अहम सवाल — असली और फर्जी पत्रकार

प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की संख्या लगभग दस से पंद्रह हो सकती है। इससे अधिक होने की संभावना बेहद कम है।

वहीं प्रिंट मीडिया की छोटी एजेंसी लेकर काम करने वाले पत्रकारों की संख्या 700 से भी अधिक होने का अनुमान है। इसकी वजह यह है कि अनेक लोग सिर्फ पत्रकार का आईडी कार्ड रखने के लिए संस्थानों से सदस्यता लिए हुए हैं।

डिजिटल मीडिया के पत्रकारों की संख्या जिले भर में बमुश्किल 50 से अधिक नहीं है। लेकिन इनमें भी बहुत कम न्यूज मीडिया वेबसाइट्स ऐसी हैं जो नियमित रूप से चल रही हैं और पत्रकारिता के नियमों का पालन कर रही हैं।

असली और फर्जी पत्रकार का सवाल — कितना सही?

जिले में असली पत्रकार कितने हैं और फर्जी पत्रकार कितने हैं — यह सवाल पहली नजर में बेहद बचकाना लगता है।

जाहिर सी बात है, जो पत्रकार नियमित और सुचारू रूप से खबरों और सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं और जिनकी आय पत्रकारिता पर निर्भर है, ऐसे पत्रकारों को पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं है।

अब आप कहेंगे — तो क्या जिले में फर्जी पत्रकार हैं ही नहीं ?

नहीं, ऐसा भी नहीं है। लेकिन यहां फर्क बेहद महीन है। यही वह लूपहोल है जो अवैध वसूली को जन्म देता है।

इसके लिए काफी हद तक वे संस्थान जिम्मेदार हैं, जो बिना अधिक जांच-पड़ताल किए आसानी से आईडी कार्ड उपलब्ध करा देते हैं।

ऐसे संस्थानों में छोटे प्रिंट मीडिया और कुछ डिजिटल मीडिया संस्थान भी शामिल हैं।

हालांकि, इस तरह की पत्रकारिता को पहचानना भी कोई मुश्किल काम नहीं होता, क्योंकि यह अधिकतर छोटे कस्बों और स्थानीय स्तर पर ही सीमित रहती है।

अगले अंक में जारी...
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