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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

किराया वसूली के बाद टिकट गायब!

नरसिंहपुर–जबलपुर–गाडरवारा रूट की बसों में रोज़ हो रहा खुला खेल

सरकारी नियमों और परिवहन व्यवस्था की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए नरसिंहपुर से जबलपुर और नरसिंहपुर से गाडरवारा रूट पर चलने वाली अधिकांश बसों में एक गंभीर अनियमितता रोज़ देखी जा रही है।

बस में हर तकरीबन 4 - 5 यात्रियों में से एक को कंडक्टर किराया लेने के बावजूद टिकट नहीं देता।

यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक रोज़मर्रा की सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है। कंडक्टर अपनी मनमर्जी से यह तय करता है कि किसे टिकट देना है और किसे नहीं। जो यात्री टिकट की मांग करता है, उसके साथ बहस, तकरार और कई बार अपमानजनक व्यवहार तक की स्थिति बन जाती है।

भीड़ बनी बहाना, लापरवाही बनी आदत

बसों में जब अत्यधिक भीड़ होती है, तब कंडक्टर अक्सर टिकट देना ही छोड़ देते हैं। यात्रियों की मजबूरी, जल्दी पहुंचने की हड़बड़ी और व्यवस्था से अनजान होने का फायदा उठाकर टिकट जनरेट नहीं किया जाता।

चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकांश यात्री भी इस पर ध्यान नहीं देते, न ही विरोध करते हैं। यही चुप्पी कंडक्टरों के हौसले और बढ़ा रही है।

किराया जेब में, टिकट सिस्टम से बाहर

किराया वसूला गया, लेकिन टिकट मशीन से जनरेट ही नहीं किया गया — यह सीधा गबन है।

इस तरह की कार्यप्रणाली से यह साफ़ हो जाता है कि कंडक्टर केवल यात्रियों को ही नहीं, बल्कि बस मालिकों और परिवहन विभाग को भी चूना लगा रहे हैं।

जो राशि टिकट सिस्टम में दर्ज ही नहीं हुई, वह किसकी जेब में जा रही है — यह सवाल खुद में एक जांच की मांग करता है।

नियंत्रण और निगरानी कहां है?

परिवहन विभाग द्वारा लगाए गए टिकटिंग नियम, और निर्देश यदि ज़मीन पर लागू ही नहीं हो रहे, तो फिर निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था किस काम की?

  • क्या बसों की नियमित जांच होती है?
  • क्या टिकट का डेटा कभी मिलान किया जाता है?
  • क्या यात्रियों की शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है?

यात्री भी जिम्मेदार

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इस अव्यवस्था के लिए यात्री भी कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं। टिकट न मिलने पर चुप रहना, बहस से बचना और इसे सामान्य मान लेना — यही सोच इस गड़बड़ी को जिंदा रखे हुए है।

आज टिकट नहीं मांगा, कल किराया भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

सवाल सिस्टम से है

यह मामला केवल एक-दो कंडक्टरों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की लापरवाही और ढिलाई को उजागर करता है। यदि समय रहते इस पर सख़्ती नहीं हुई, तो यह भ्रष्टाचार और गहराता जाएगा।

अब सवाल यह है — परिवहन विभाग कब जागेगा?

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