शीर्षक कुछ अजीब लगा क्या आपको?
नमस्कार मैं विक्रम आपका दोस्त,लेखक और पत्रकार आज आपके साथ अपने दिल की कुछ बातें करने जा रहा हूं ।
आज जो लिख रहा हूं वह एक पत्रकार के नजरिए से नहीं है और न यह किसी लेख,रिपोर्ट या स्टोरी का हिस्सा है, न यह आलोचना है, न व्यंग्य। यह तो बस दिल में उठ रही वो बातें हैं, जो मैं आपसे करना चाहता हूं,कहना चाहता हूं! व्हाट्सएप, फेसबुक, पब्लिक ऐप, यूट्यूब और वेबसाइट पर हमारे 4000000 l. Readers (चालीस लाख पाठक) मौजूद हैं, इसलिए आप सबसे आज यह बात करना जरूरी समझ रहा हूं!
यह कोई कहने की बात नहीं है कि, फिलहाल देश के आंतरिक हालात संतोषजनक दिखाई नहीं दे रहे हैं लेकिन अभी हम उन कारणों पर बात नहीं करने जा रहे हैं!
हिंदू मुस्लिम विवादों को लेकर जिस तरह की घटनाएं देखने सुनने को मिल रही हैं, मैं इसे लेकर बहुत चिंतित हूं! कभी सोचता हूं,कि आगे क्या होने वाला है?
क्या हम फिर से बंटवारे का कत्लेआम देखेंगे? क्या सभी मुस्लिमों को देश से बाहर कर दिया जाएगा? क्या सब एक दूसरे को काटने मारने की नजरों से ही देखेंगे?
क्यों हो रहा है यह सब? ये सब तो चल ही रहा था! यूजीसी ने आकर प्याज की एक और परत उधेड़ दी! पहले हिन्दू मुस्लिम और अब स्वर्ण बनाम, , ,st/sc/obc हो गया! गालियां दी जा रही हैं, , बेहूदा नारे समाज में जहर की हवा को फैला रहे हैं!
कभी सोचता हूं तो घबरा जाता हूं, , आने वाला समय कैसा होगा? क्या धर्म और जाती के ये मुद्दे हिंसा और नफरत से सुलझाने की कोशिशें की जाती रहेंगी?
लोग कहते हैं कि, हम समझते हैं कि, राजनेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं! अगर लोग समझ रहे हैं तो फिर इस तरह के बवाल क्यों हो रहे हैं? क्यों दंगे,फसाद और कत्ले आम?
जब रात को बिस्तर पर लेटता हूं तब मन में अनेक सवाल उठते हैं कि, क्या इस सबका कोई समाधान है ही नहीं, , या अब लोग समाधान देखना नहीं चाह रहे , , हिंसा में रस आने लगा है? कोई कैसे धर्म और जाती के नाम पर हो रही मौतों को जायज ठहरा सकता है?
© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
