दो साल से नीलामी की राशि गायब, जवाबदेही भी लापता
दूध की रखवाली जब बिल्ली करे, तो दूध बचा रहे — यह उम्मीद ही क्यों?
दो वर्षों से बाज़ार नीलामी की राशि विभाग में जमा नहीं हो रही है। यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित गबन का सीधा संकेत है। कहावत है — “लोभ बुरी बला है”, और चालीस हज़ार रुपए देखकर बलराम की नीयत फिसल जाना इसी का उदाहरण है।
जिस व्यक्ति ने अपनी पत्नी के संवैधानिक पद का दुरुपयोग किया हो, उससे गांव के विकास की उम्मीद करना “सांप से दूध की रखवाली” कराने जैसा है। जो अपने ही घर में ईमान न रख सके, वह पंचायत का क्या हिसाब देगा?
जब हमाम में सब नंगे हों, तो फिर किसे किससे शर्म?
शिकायतें दर्ज हैं, दस्तावेज़ मौजूद हैं, फिर भी अधिकारी कार्यवाही से बचते नज़र आते हैं। कारण साफ है — “चोर चोर मौसेरे भाई” जो ठहरे। गबन के मामलों पर आते ही इन अधिकारियों के मुंह में दही जम जाता है।
फाइलें इस तरह दबाई जाती हैं जैसे “आंखों देखी मक्खी निगल ली हो।” और दूसरी ओर विकास के आंकड़े ऐसे पेश किए जाते हैं जैसे “खाली बर्तन ज़्यादा आवाज़ करते हैं।”
नाम बड़े और दर्शन छोटे — यही है काग़ज़ी विकास की असल पहचान।
सरपंच पति सेवा के नाम पर दलाली में जुटे हैं, अधिकारी कमीशन को प्रक्रिया बताते हैं, और जनता की हालत “आसमान से गिरे, खजूर में अटके” जैसी हो गई है। न्याय यहां “अंधे के हाथ बटेर” बन चुका है।
गांव का विकास अपाहिज नहीं हुआ, बल्कि शासन और प्रशासन ने मिलकर उसका अपहरण कर लिया है। और जनता आज भी उसी विकास का इंतजार कर रही है, जिसकी तस्वीरें केवल रिपोर्टों में जिंदा हैं।
