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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

पैसा चाहिए… या प्रदेश का विकास?

सवाल आसान नहीं है। लेकिन ज़रूरी है।

आपको पैसा चाहिए… या प्रदेश?

यह वही सवाल है, जिसे हम अक्सर टाल देते हैं। शायद इसलिए कि हर महीने कुछ न कुछ हमारे खाते में आ रहा है। राहत मिल रही है। और राहत हमेशा सुकून देती है।

लेकिन क्या राहत ही विकास है?

आंकड़ों की तस्वीर

मध्य प्रदेश — लगभग 8.9 करोड़ की आबादी।

करीब 5.37 करोड़ लोग हर महीने मुफ्त राशन पर निर्भर। और 1.25 करोड़ से अधिक महिलाओं को “लाड़ली बहना” योजना के तहत नकद सहायता।

अब ठहरकर सोचिए… अगर आधे से ज्यादा प्रदेश किसी न किसी मुफ्त योजना पर निर्भर है, तो यह गरीबी घटने का संकेत है… या गरीबी के स्थायी हो जाने का?

क्या ये योजनाएँ सामाजिक सुरक्षा हैं… या राजनीतिक निवेश?

सुप्रीम कोर्ट पहले भी “फ्रीबी कल्चर” पर चिंता जता चुका है। लेकिन सवाल अदालत का नहीं… हमारा है।

कर्ज का सच

प्रदेश पर कुल कर्ज लगभग ₹4.90 लाख करोड़। और अनुमान है कि मार्च 2026 तक यह आंकड़ा ₹5.31 लाख करोड़ को छू सकता है।

राज्य का वार्षिक बजट लगभग ₹4.21 लाख करोड़। मतलब साफ है — हम जितना कमा रहे हैं, उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं।

और खर्च कहाँ हो रहा है? क्या राजस्व बढ़ाने पर? क्या नए उद्योग लगाने पर? क्या रोजगार सृजन पर? या फिर उन योजनाओं पर, जो तुरंत लोकप्रियता देती हैं… लेकिन लंबे समय में वित्तीय बोझ बढ़ाती हैं?

सवाल जो चुभेंगे

क्या मुफ्त राशन स्थायी समाधान है?

क्या नकद सहायता आत्मनिर्भर बनाती है… या निर्भर?

अगर आज हम “मुफ्त” ले रहे हैं… तो क्या कल हमारे बच्चे “ब्याज” नहीं चुकाएँगे?

क्या हमें विकास चाहिए… या सिर्फ राहत?

क्या हमें रोजगार चाहिए… या हर महीने मिलने वाला ट्रांसफर?

ज़मीन की हकीकत

चाहे चिचली हो… करेली हो… या गोटेगांव… बेरोज़गारी एक सच्चाई है। छोटे उद्योग संघर्ष कर रहे हैं। युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में साल दर साल झोंक रहे हैं, लेकिन नियुक्तियाँ सीमित हैं।

फिर भी हम संतुष्ट हैं। क्योंकि खाते में पैसा आ गया।

संतुलन की जरूरत

यह संपादकीय योजनाओं के विरोध में नहीं है। ज़रूरतमंद को सहारा मिलना ही चाहिए। सामाजिक सुरक्षा किसी भी लोकतंत्र की जिम्मेदारी है।

लेकिन सवाल यह है — क्या यह सहारा अस्थायी है? या यही भविष्य बनने जा रहा है?

प्रदेश तब मजबूत होता है, जब उसके लोग कमाते हैं।

सरकार अगर सहारा दे — तो उचित है। लेकिन अगर सहारा स्थायी बैसाखी बन जाए, तो ठहरकर सोचने की जरूरत है।

अंतिम सवाल

आपको पैसा चाहिए… या प्रदेश?

— विक्रम सिंह राजपूत

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