क्या फर्क पड़ता है, जब सिस्टम ही करप्ट हो?
| नरसिंहपुर |
आप विकास की कितनी भी दुहाई दे लो। दीवारों पर रंग-बिरंगे भित्ति चित्र बना दो, फाइलों में आंकड़ों को चमका दो, प्रेज़ेंटेशन में “मॉडल डिस्ट्रिक्ट” लिख दो— लेकिन ज़रा बताइए, क्या फर्क पड़ता है, जब सिस्टम ही सड़ चुका हो?
शहर हो, तहसील हो या कस्बा— हालात में फर्क बस इतना है कि कहीं गड्ढे दिखते हैं, कहीं उन्हीं गड्ढों पर पोस्टर चिपका दिए जाते हैं। और हाँ, चुप रहने से सच अपने आप “विकास” में नहीं बदल जाता!
बड़े-बड़े मंचों से जिले के विकास की तस्वीर ऐसी खींची जाती है, मानो नरसिंहपुर कोई अंतरराष्ट्रीय स्मार्ट सिटी हो!
हकीकत यह है कि हर साल करोड़ों-अरबों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, लेकिन आज तक जिले में एक भी ऐसा गांव नहीं बन पाया, जिसे दिखाकर कहा जा सके— “देखो, यह है असली विकास!”
ग्रामीण हकीकत बनाम सरकारी दावे
अंदरूनी पहाड़ी और ग्रामीण अंचलों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाएं नाम मात्र हैं। सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी जरूरतें कई गांवों के लिए अब भी सपना बनी हुई हैं। और यह सब तब है, जब हर साल “विकास” के नाम पर करोड़ों का बजट डकारा जा रहा है।
ग्रामीण स्कूलों की हालत देख लीजिए— सुरक्षा और स्वच्छता जैसे शब्द शायद सिर्फ सरकारी फाइलों में ही जिंदा हैं। कई इलाकों में आज भी बच्चे नदी-नाले पार कर स्कूल पहुंचते हैं, क्योंकि रास्ते में पुल-पुलिया बनाना प्राथमिकता नहीं है।
बरसात में बच्चों की जान जोखिम में डालकर हम तालियां बजाते हैं— वाह! क्या शानदार सिस्टम है!
2026 का विकास या आंकड़ों का भ्रम?
नरसिंहपुर जिले में 450 ग्राम पंचायतें और लगभग 1150 गांव हैं। सवाल सीधा है— क्या इन 1150 गांवों में से एक भी ऐसा गांव है, जो आधुनिकता और विकास की रफ्तार से कदम मिला पाया हो?
क्या आप जानते हैं जिले की बेरोजगारी दर? महंगाई का स्तर? मृत्यु दर का अनुपात? और एक साल में इन गांवों के विकास पर वास्तव में कितनी राशि खर्च की गई?
ये सवाल जरूरी हैं, लेकिन शायद अब चर्चा के लायक नहीं रहे। क्योंकि जाति और धर्म के शोर में जमीनी मुद्दों की आवाज कहीं दब चुकी है।
आबादी, गरीबी और किसान की पीड़ा
वर्ष 2026 में नरसिंहपुर जिले की अनुमानित आबादी लगभग 12.68 लाख बताई जा रही है! इसमें से एक बड़ा हिस्सा आज भी गरीबी रेखा के नीचे सरकारी अनाज और सहायता के सहारे जिंदगी काट रहा है।
मध्यम वर्ग महंगाई और कम आय की मार झेल रहा है, वहीं किसान आए दिन शासन-प्रशासन से टकराव की स्थिति में हैं। क्या यही संतोषजनक हालात कहलाते हैं?
और सबसे बड़ा मज़ाक यह है कि इस पूरे हालात को “सफल शासन” कहा जा रहा है।
फाइलों में विकास दौड़ रहा है, मंचों से तालियां गूंज रही हैं, और ज़मीन पर आम आदमी सवालों के बोझ तले दबा हुआ है।
सिस्टम खुद को आईना दिखाने की बजाय, हर सवाल पूछने वाले को चुप कराने में लगा है।
जब जवाब देने की जगह जश्न मनाया जाए, जब असफलता को उपलब्धि बताया जाए, और जब लूट को विकास का नाम दिया जाए—
तब सच में पूछना पड़ता है कि क्या फर्क पड़ता है, जब सिस्टम ही करप्ट हो?
लेकिन इन सबके बावजूद जिम्मेदार अपने ही हाथों अपनी पीठ थपथपाकर “सब चंगा सी” का ढोल पीट रहे हैं।
तो एक बार फिर वही सवाल—
क्या फर्क पड़ता है, जब सिस्टम ही करप्ट हो?
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