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सहावन में सचिव–सरपंच की मनमानी?

आंगनबाड़ी निर्माण की आड़ में पंचायत व्यवस्था को नोचता भ्रष्टाचार

चिचली जनपद अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत सहावन आज विकास की मिसाल नहीं, बल्कि लूट, लालच और साजिश का जीवंत दस्तावेज बन चुकी है? आंगनबाड़ी निर्माण जैसे संवेदनशील और जनहितकारी कार्य में सचिव तेजराम और सरपंच बलबीर के नाम पर सीधे-सीधे बिल लगाकर भुगतान दर्शाया जाना यह साफ कर देता है कि यहां नियम नहीं, बल्कि अपराधी मानसिकता काम कर रही है!

यह कोई कागजी भूल नहीं, बल्कि सोची-समझी लूट की पटकथा है!

आंगनबाड़ी निर्माण कार्यों में भुगतान का स्पष्ट प्रावधान है, लेकिन यहां सचिव और सरपंच खुद ही ठेकेदार, सप्लायर और लाभार्थी बन बैठे?सवाल यह नहीं कि बिल कैसे लगे, सवाल यह है कि किस कानून ने इन्हें सरकारी योजनाओं को निजी तिजोरी बनाने की छूट दी?

प्रशासन की चुप्पी या हिस्सेदारी?

सबसे भयावह तस्वीर तब सामने आती है जब यह सब कुछ जनपद चिचली के अधिकारियों की आंखों के सामने हुआ! भुगतान पास हुए, फाइलें चलीं, हस्ताक्षर हुए— और किसी ने भी सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई!

क्या यह लापरवाही है या फिर इस लूट का हिस्सा ऊपर तक बंट चुका है?

जब निगरानी व्यवस्था दम तोड़ देती है, तब भ्रष्टाचार खूंखार जानवर बनकर पंचायत प्रणाली को नोचने लगता है। सहावन आज उसी खूंखार सच का नाम है।

चांदी के सिक्कों ने इंसानियत रौंद दी

क्या चांदी के सिक्कों की भूख इतनी बढ़ गई थी कि अपने ही गांव के बच्चों और महिलाओं के हिस्से को लूटने में भी इन लोगों को शर्म नहीं आई? जिन ईंटों से भविष्य की नींव रखी जानी थी, वही ईंटें लालच की दीवार बनकर सरपंच और सचिव की तिजोरियों में चुन दी गईं!

यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, यह गरीब के हक़ की हत्या है।

जो लोग इंसानी लहू की आख़िरी बूंद तक निचोड़ कर अपनी जेबें भरते हैं, वे यह मानकर चलते हैं कि वे हमेशा कानून से ऊपर रहेंगे। लेकिन जब ऐसे भ्रष्टाचारी हैवानों के चेहरे से नकाब उतरता है, तब गुनाह छिपाना नामुमकिन हो जाता है।

अब सवाल सहावन से आगे का है

अब सवाल यह नहीं कि बिल क्यों लगे— सवाल यह है कि जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन क्यों हैं?
क्या इस लूट को दबाने की तैयारी है, या फिर कभी इन फाइलों से सच की आग निकलेगी?

अगर इस मामले में भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाए कि यहां पंचायत नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का साम्राज्य चल रहा है— जहां सरपंच और सचिव नहीं, बल्कि लुटेरे राज कर रहे हैं।

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