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सत्य और समाज के बीच की कड़ी

क्या दो-तीन सौ के ‘डोनेशन’ में पंचायतों को मिल गया भ्रष्टाचार का लाइसेंस?

मीडिया डोनेशन और विज्ञापन को समझ लिया गया है ‘क्लीन चिट’ का तरीका?

ग्राम पंचायतों के भीतर इन दिनों एक खतरनाक ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है—छोटे-छोटे डोनेशन के नाम पर गलतियों और अनियमितताओं को ढकने की कोशिश। दो सौ, तीन सौ, पाँच सौ रुपए देकर मामला रफा-दफा… मानो भ्रष्टाचार का लाइसेंस अब किराए पर मिलने लगा हो!

"डोनेशन का मतलब सेवा नहीं—अब शिकायत दबाने की फीस समझ लिया गया है!"

सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या पंचायतें अब डोनेशन को एक तरह का सुरक्षा कवच मानने लगी हैं? क्या यह नया तरीका है जिससे गलत कामों को वैधता दी जा रही है? और क्या मीडिया डोनेशन एवं विज्ञापन को लोग अब ‘क्लीन चिट’ का शॉर्टकट समझने लगे हैं?

क्या दो-तीन सौ रुपए का डोनेशन भ्रष्टाचार को छुपाने का नया ‘पासपोर्ट’ बन गया है?

कुछ पंचायतों में देखा गया है कि जैसे ही कोई सवाल उठता है, तत्काल दो-चार सौ रुपए का ‘डोनेशन’ देने की बात सामने आ जाती है। यदि यह पैटर्न सामान्य हो गया, तो पंचायतें सेवा से नहीं—सौदेबाज़ी से चलेंगी।

विज्ञापन और मीडिया डोनेशन के नाम पर भी कई जगहों पर जांचों को टालने या शिकायतों को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिशें सामने आ रही हैं। यह लोकतंत्र की मूल भावना—पारदर्शिता और जवाबदेही—को चोट पहुँचाता है।

अब जरूरी क्या है?

  • डोनेशन का सार्वजनिक रजिस्टर — राशि, दाता और उद्देश्य स्पष्ट दर्ज हों।
  • विज्ञापन/प्रचार के लिए पारदर्शी नियम — कोई भी राशि बिना रिकॉर्ड न ली जाए।
  • जनता की खुली बैठक — मासिक समीक्षा और जांच रिपोर्ट पेश की जाए।

अगर आपकी पंचायत में भी ऐसे मामले हो रहे हैं, आप हमें सूचना भेज सकते हैं। आपकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी।

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