सचिव कहता है — “500-1500 रु ले लो, खबर दबा दो?”
ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की ‘डील’ बन गई नई व्यवस्था?
चिचली जनपद के अंतर्गत आने वाली कई ग्राम पंचायतों में हालात ऐसे बदतर हो चले हैं कि अगर आप
सवाल उठाएँ तो सचिव-सरपंच की पहली कोशिश यही रहती है कि—
“कितना चाहिए? 500? 1000? 1500? ले लो… बस खबर मत चलाना!”
पंचायतों में अब ‘काम’ से ज्यादा ‘डील’ चल रही है। सच बोलिए, सवाल उठाइए — और तुरंत दबाव, पैसे की पेशकश या मामले को रद्द करने का खेल शुरू।
स्थानीय जनप्रतिनिधि और पंचायत तंत्र अब जवाबदेही से नहीं, बल्कि सेटिंग से चल रहा है। आपत्तियाँ उठती हैं तो सचिव-सरपंच पैनल सीधे DM/SP नहीं, बल्कि पहले रिपोर्टर की जेब देखता है।
करेली जनपद की रांकई पंचायत भी दे चुकी है ऐसा ही उदाहरण
कुछ दिन पूर्व करेली जनपद की रांकई ग्राम पंचायत में भी बिल्कुल यही स्क्रिप्ट चली थी— अनियमितताओं पर सवाल उठाए गए और पूरे तंत्र ने खबर रोकने की पुरानी ‘डील नीति’ को आगे बढ़ाया। सवाल यह है कि क्या गबन और फर्जीवाड़े के खिलाफ आवाज उठाना अब अपराध माना जाएगा?
भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने वाले को ही अब “समझौता” करने की सलाह दी जा रही है। यह पंचायत तंत्र की असल स्थिति की भयावह तस्वीर है। मोहपानी पंचायत से भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रलोभन देने के प्रयास किए गए!
मुख्य सवाल — आखिर पंचायतें किस रास्ते पर जा रही हैं?
• क्या पंचायतें जनता के काम से ज्यादा ‘खबर दबाने की फीस’ तय करने में व्यस्त हैं?
• क्या शिकायतकर्ता ही अपराधी बन गया है?
• प्रशासन इस खुले भ्रष्टाचार मॉडल पर कब कार्रवाई करेगा?
चिचली और करेली क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में यह मानसिकता तेजी से फैल रही है कि
“पैसा देकर मामला सुलझाओ—सवाल मत पूछो।”
यह न केवल लोकतंत्र के स्थानीय ढांचे को कमजोर कर रहा है, बल्कि
क्षेत्र में भ्रष्टाचार को वैध ठप्पा दे रहा है।
