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*एक जिंदगी ऐसी भी?* *मानसिक दिव्यांग शोषण का शिकार?*

⭕विवेचना⭕ मेरी कलम से🖋️📖

नमस्ते,आदाब, सत श्री अकाल, गुड नून🙏🏻

आप सभी पाठकों का एक बार फिर हम आभार व्यक्त करते हैं।

आज हम समाज के उस हिस्से के बारे में बात करेंगे,जिसके बारे में बातें तो बहुत की जाती हैं,विकास के लिए ढेरों योजनाएं भी हैं,लेकिन फिर भी समाज का वह हिस्सा आज भी उपेक्षित ही दिखाई देता है।

दरअसल आज हम दिव्यांग भाई बहनों के बारे में चर्चा कर रहे हैं,खासतौर पर मानसिक दिव्यांग भाई बहनों से जुड़ा हुआ है,हमारा आज का यह विषय।

हाल ही मे मुझे नीता (परिवर्तित नाम) 28 वर्षीय मानसिक दिव्यांग युवती से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ।इस दौरान हमने मानसिक दिव्यांगों को होने वाली समस्याओं के बारे में जानने की कोशिश की।तकरीबन एक माह तक नीता के दैनिक चर्या का गहन विश्लेषण किया।

विश्लेषण के दौरान जो सच सामने आया,वह समाज के खौफनाक चेहरे को उजागर करता है।

दरअसल नीता एक कमरे के छोटे से मकान में अपनी मां और बड़े भाई के साथ रहती है,पास में ही खपरैल नुमा एक छोटे संकरे कमरे में दादी और बुआ रहती है। नीता आठ दस साल की थी,तभी नीता के पिता का देहांत हो गया था। मां आसपास के घरों में खाना बनाने का काम करती है।भाई कभी कभार कोई काम करता भी है तो, पैसों को शराब में उड़ा देता है।

नीता के अपने ही लगातार उसका उपहास उड़ाते हैं।अक्सर उसे ताना मारते हुए कहते यह तो पायल हैं। वहीं बड़ा भाई अक्सर शराब के नशे में नीता से मारपीट करता है।दादी और बुआ का रवैया भी नीता के साथ ठीक नही है।

उस पर भी विडंबना यह की नीता ना ही इस मारपीट का विरोध कर पाती है,और ना ही किसी से कुछ बोल पाती है, बस आए दिन दर्द से कराहती रहती है,शरीर पर सूजन और खरोंचों के निशान लिए।जो गवाह हैं उसके साथ हुई हैवानियत के।

नीता कभी कभी नाराज हो जाने पर चिल्लाती है लेकिन यह विरोध के लिए काफी नहीं है। नीता के साथ बंद दरवाजों के पीछे रिश्तों की आड़ में अमानवीय व्यवहार होता है।

जारी :


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