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*गांव हो जाएंगे युवा विहीन?: गांव में कोई भविष्य नहीं है?*

दरअसल पलायन की ये कहानियां उन सैकडों ग्रामीण युवाओं की जिंदगी का लेखा जोखा हैं, जो रोटी, रोजगार और तरक्की की तलाश में शहर आ गए।हमने कुछ युवाओं से पलायन के बाद उनकी जिंदगी में आए बदलाव के बारे में जानना चाहा।

सुनील अपनी कहानी कुछ यूं बयां करते हैं... 

एक कमरे का अपना कच्चा घर दिखाते हुए वह छत दिखाना नहीं भूलते।बरसात की रातों में कई जगहों से दरक गई खपरैल के नीचे सोना आसान नहीं होता। दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद रात को चैन की नींद भी नसीब नही हो पति है।

बच्चों को अच्छी शिक्षा का सपना, बेहतर स्वास्थ सुविधाओं की तलाश और एक अच्छे रोजगार की तलाश में गांव से आए सुनील बताते हैं कि, कोई रोज़गार के लिए, तो कोई अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए परिवार समेत शहर की ओर पलायन करने पर मजबूर है।न तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध है और न ही स्थानीय स्तर पर रोज़गार का कोई विशेष साधन उपलब्ध है।रोज़गार की खातिर गांव के अधिकांश युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

पिछले साल ही अपनी पत्नी और दस साल के छोटे बच्चे के साथ सुनील शहर के एक छोटे से कमरे में किराए से रहने के लिए आए हैं। सुनील का कहना है की,शहरों में रहने के लिए उच्च किराए, भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल जैसे खर्चों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है।

आमदनी कम है और शहर में खर्चे अधिक हैं इसलिए सुनील की पत्नी भी अब मजदूरी पर जाती है।वहीं सुनील एक स्थानीय दुकानदार के यहां छः हजार रुपए मासिक वेतन पर काम करता है, पति पत्नी के दोनो के काम करने के बाद भी वह इतना नही बचा पाता है कि,कुछ पैसे अपने बूढ़े मां बाप के लिए गांव भेज सके। मकान का किराया, बिजली बिल और स्कूल एवम कोचिंग की फीस चुकाने के बाद घर का बजट डांवडोल हो जाता है, खाने पीने का सामान गेहूं,अनाज दालें घर से बुलवाना पड़ती हैं, तब जाकर जैसे तैसे महीना गुजरता है।बढ़ती महंगाई के चलते परिवार का भरण पोषण करना भी मुश्किल हो रहा है।

सुनील कहता है की,सुविधाओं की उम्मीद में हम शहर तो आ गए लेकिन यहां ना गांव जैसा सुकून है और ना ही गांव जैसा अपनापन। सुनील जल्द ही घर लौटने की बात करते हैं।

शहरों में जीवन की रफ्तार तेज होने के कारण लोगों को अधिक तनाव में रहना पड़ता है। जबकि गांवों में जीवन की रफ्तार धीमी होती है और लोग एक-दूसरे के करीब रहते हैं।

सिक्के का दूसरा पहलू भी है,इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। दरअसल पलायन का दर्द सबसे अधिक माता पिता को उठाना पड़ता है। गांव की एक वृद्ध विकलांग महिला अपना दर्द बयां करते हुए कहती हैं कि,बच्चों का यह सोचकर पालन पोषण किया कि वह बुढ़ापे का सहारा बनेंगे, लेकिन बच्चे रोज़गार की खातिर शहर में जाकर बस गए और वहीं के होकर रह गए।

कभी कभी गांव आते भी हैं लेकिन फिर जल्द ही शहर लौट जाते हैं। अब उम्र के इस मोड़ पर अकेले जीना पड़ रहा है।लोगों को लगता है कि गांव में कोई भविष्य नहीं है।

पलायन मौसमी तर्ज पर हो या फिर जीविका की संकट की स्थिति में सबसे गहरी चोट दलितों और आदिवासीयों पर पड़ती है जो गरीबों के बीच सबसे गरीब की श्रेणी में आते हैं और जिनके पास भौतिक या मानवीय संसाधन नाममात्र को होते हैं।शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ रहा है। इससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं।

।। विवेचना।।

जारी : 







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