नरसिंहपुर।
जिले वासियों ने आज नव वर्ष पर नर्मदा तटों पर जाकर पिकनिक मनाने के बाद फिर से यह बता दिया है कि हम मां भी कहेंगे और सुधरेंगे भी नहीं।नर्मदा के चरणों में शीश झुकाकर,कन्याओं के पैर पड़कर,नारियल और अगरबत्ती की भेंट चढ़ाकर अपने आप को भक्तों की श्रेणी में रखने वाले तमाम लोग अपने झूठे दोना पत्तल, डिस्पोजल, प्लास्टिक बॉटल,पेपर के टुकड़े,शराब की खाली बॉटल,नारियल के जुट,अगरबत्ती के खाली पेकेट, चिप्स कुरकुरे के खाली पाउच इत्यादि अपशिष्ट सामग्री नर्मदा तटों पर ही छोड़ आए हैं।अव्वल दर्ज की बेशर्मी की बात तो यह है कि ढिठाई दिखाते हुए ऐसे तमाम लोग प्रशासन को ही कोसेंगे।प्रशासन ने कोई कानून तो नही निकाल है की नर्मदा नदी को मां कहो।यह तो सनातन सत्य है की पतित पावनी जीवन दायनी नर्मदा हम सभी की पालनहारी मां है।क्या खुद की कोई जिम्मेदारी नहीं है अपनी मां के प्रति? गोद आप उसकी गंदी करते हैं और दोषारोपण प्रशासन पर यह कैसा न्याय है?यह जिले के स्थानीय निवासियों की उपेक्षा और उदासीनता का ही नतीजा है कि आज नर्मदा का अस्तित्व ही संकट में है।किसी के भी पास पिकनिक मनाने और नर्मदा जयंती पर भंडारों में प्रसाद पाने के लिए जाने के अलावा कभी यह जाकर देखने का समय नहीं है की आखिर हमारी मां को गंदा कौन कर रहा है!कौन हमारी मां का सीना छलनी कर रहा है। देर सवेर प्रशासन तो अपना काम करेगा ही किंतु आप अपनी भक्ति का झूठा दंभ भरते रहिए क्यों की दूसरे की आत्मा में झांककर देखने का कोई यंत्र नही है और खुद की आत्मा की आवाज को तो अनसुना कर दिया जाता है।महज चंद गिने चुने लोग ही सतर्कता बरतते नजर आए जिन्हे भक्ति के साथ नर्मदा की पवित्रता की भी परवाह थी।
ऐसी ही कुछ स्थिति दूल्हा देव दरबार पर भी नजर आई।जहां भूखों को भोजन और प्रसाद के उद्देश्य से प्रसाद वितरण किया जा रहा था वहीं दूसरी ओर लोग प्रदान ग्रहण करने के बाद श्रद्धा दिखात हुए पैर पड़कर दोने और डिस्पोजेबल ग्लास यहां वहां फेक रहे थे।एक तरफ जहां भक्तों का हुजूम सड़कों पर ही नारियल फोड़ रहा था अगरबत्ती लगा रहा था वहीं दूसरी तरफ अधिकांश लोग मंदिर परिसर के आसपास ही अपने झूठे दोने फेककर अव्यवस्था फैला रहे थे।ऐसी भक्ति को क्या नाम दिया जाना चाहिए!