"भाजपा राज में सोनम वांगचुक के साथ भी वही होगा जो इरोम शर्मिला के साथ हुआ था?"
(मुख्यधारा का मीडिया उनके नियंत्रण में...सरकारें इतनी बहरी हो चुकी.....)
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि, जंतर मंतर पर सोनम वांगचुक बीते तकरीबन अठारह दिन से भूख हड़ताल पर हैं!
आपको क्या लगता है कि,क्या सरकार झुकेगी? जबकि मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अभी तक आधिकारिक तौर पर सरकार ने सोनम वांगचुक से कोई संपर्क नहीं किया!
तो क्या सोनम वांगचुक सरकार के इस रवैए से अंजान थे? क्या वे अपने ही पिछले अनुभवों का विश्लेषण करना भूल गए?
सोनम वांगचुक का पिछला संघर्ष
सोनम वांगचुक ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल कराने के लिए उन्होंने शून्य से भी नीचे के तापमान में 21 दिन की कड़ी भूख हड़ताल की थी!
तब यह भूख हड़ताल 6 मार्च 2024 को शुरू होकर 26 मार्च 2024 तक चली थी। इस दौरान उन्होंने केवल पानी और नमक के सहारे 21 दिन का उपवास पूरा किया था!
लेकिन नतीजा? सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानीं। बातचीत के दौर जरूर चले, लेकिन सरकार ने छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा देने से साफ इनकार कर दिया।
इरोम शर्मिला का संघर्ष
लेकिन या देश का इकलौता ऐसा मामला नहीं है, इसके पूर्व इरोम शर्मिला भी सिस्टम की उदासीनता का शिकार हुईं!
2 नवंबर 2000 को मणिपुर के मालोम में असम राइफल्स के हाथों 10 बेगुनाह नागरिक मारे गए (जिसे 'मालोम नरसंहार' कहा जाता है), तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा (NDA) सरकार सत्ता में थी। इसी घटना के तुरंत बाद इरोम शर्मिला ने अपना अनशन शुरू किया था।
इरोम शर्मिला ने अपने 16 साल लंबे अनशन के दौरान अपने मुंह से खाना या पानी बिल्कुल नहीं लिया था।
लेकिन उन्हें जीवित रखने के लिए प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार करके अस्पताल के एक कमरे को ही जेल बना दिया था और जबरन नाक में एक नली डालकर उसके जरिए तरल भोजन (जैसे ग्लूकोज, विटामिंस और जरूरी पोषक तत्व) सीधे उनके पेट तक पहुंचाया जाता था।
इसके बाद 2004 से 2014 तक पूरे 10 साल केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही! इस दौरान 'जीवन रेड्डी कमेटी' ने भी AFSPA को हटाने या इसमें बड़े बदलाव करने की सिफारिश की थी, लेकिन कांग्रेस सरकार ने भी इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया और शर्मिला जी की नाक में नली लगी रही!
जब तक उन्होंने अनशन किया, सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी! लेकिन उनके संघर्ष ने इस काले कानून पर देश और दुनिया का ध्यान खींचा! गृह मंत्रालय ने धीरे-धीरे मणिपुर के कई हिस्सों और उत्तर-पूर्व के कुछ अन्य राज्यों से AFSPA के दायरे को काफी कम कर दिया! हालांकि, यह कानून अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है!
इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
और,,,आज जैसे.. इतिहास खुद को दोहरा रहा है, बस चेहरे बदल गए हैं!
कल जो त्रासदी वर्ष 2000 में इरोम शर्मिला के साथ मणिपुर की वादियों में हो रही थी, आज 2026 में वही उपेक्षा जंतर-मंतर की तपती सड़क पर सोनम वांगचुक के साथ हो रही है।
सवाल उठता है कि आखिर "भारतीय जनता पार्टी /या कोई भी सत्तासीन सरकार" आंदोलनकारी नागरिकों को इस कदर उपेक्षित क्यों छोड़ देती है? क्या सरकारें इतनी बहरी हो चुकी हैं कि उन्हें अपनी ही जनता की टूटती सांसें दिखाई नहीं देतीं?
दरअसल सरकार जानती है कि मुख्यधारा का मीडिया उनके नियंत्रण में है। यदि वे सोनम वांगचुक के अनशन को पूरी तरह नजरअंदाज करेंगे, मीडिया में उन्हें जगह नहीं देंगे, तो धीरे-धीरे आम जनता की स्मृति से यह मुद्दा धुंधला पड़ जाएगा। सरकार का मानना होता है कि बिना बातचीत किए भी समय के साथ आंदोलनकारी खुद शारीरिक रूप से थककर हार मान लेंगे।
सत्ता को यह डर भी रहता है कि यदि वे एक आंदोलनकारी के अनशन के आगे झुक गए, तो यह देश भर के अन्य आंदोलनों के लिए एक "उदाहरण" बन जाएगा! इसलिए वे अपनी 'मजबूत और न झुकने वाली छवि' को बनाए रखने के लिए नागरिकों की जान को भी दांव पर लगाने से नहीं हिचकते!
फिर भी सोनम वांगचुक ने दोबारा यह रास्ता क्यों चुना?
शायद इसलिए क्योंकि एक सच्चे आंदोलनकारी के पास जब संवाद के सारे कानूनी और प्रशासनिक रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तो वह अपने शरीर को ही आखिरी हथियार बनाता है। यह जानते हुए भी कि सामने दीवार है, वह अपना सिर उस दीवार से टकराता है ताकि दुनिया को यह दिखे कि दीवार कितनी क्रूर और बहरी है।
आज वांगचुक अपनी हार-जीत के लिए नहीं, बल्कि इस बहरे सिस्टम का असली चेहरा देश के युवाओं और छात्रों के सामने बेनकाब करने के लिए दोबारा अनशन पर बैठे हैं।
इरोम शर्मिला के 16 साल और सोनम वांगचुक के ये 19 दिन हमें चीख-चीखकर एक ही सबक दे रहे हैं कि, सत्ता किसी भी दल की हो, उसका चरित्र हमेशा संवेदनहीन ही होता है। जब तक आंदोलन केवल 'भूख' के दम पर लड़ा जाएगा, तब तक यह बहरा सिस्टम उसे अस्पताल की नली या जंतर-मंतर की उपेक्षा की गर्त में धकेलता रहेगा।
हमें सोनम वांगचुक के जज्बे को सलाम करना होगा, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाना होगा कि क्या इस देश में अपनी बात मनवाने के लिए नागरिकों को अपनी जान की आहुति देना ही एकमात्र विकल्प बचा है?
