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वो मुस्लिम थे इसलिए मिली काल कोठरी?

( एक जैसे गुनाह पर पुलिसिया कार्रवाई के दोहरे मापदंड....)

साल 2026 में वाराणसी की इसी पावन गंगा में दो ऐसी घटनाएं हुईं जो आईने की तरह एक जैसी थीं—दोनों में पवित्र नदी के बीच नाव पर मांस पकाने या खाने को लेकर हिंदू समुदाय की धार्मिक आस्था आहत होने की बात कही गई।

लेकिन जब इस 'अपराध' पर पुलिसिया कार्रवाई का बहीखाता खुला, तो कानून की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी का रंग मजहब देखकर बदलता हुआ नजर आया?

फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट Alt News द्वारा जुटाए गए आधिकारिक दस्तावेजों ने वाराणसी पुलिस के उस सिलेक्टिव एक्शन को बेनकाब कर दिया है, जहां एक ही कृत्य के लिए एक पक्ष को दो महीने जेल की सलाखें मिलीं, तो दूसरे पक्ष को थाने से ही वीआईपी विदाई।

मार्च 2026 की घटना

मार्च 2026 का महीना था। रमजान के दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो तैरने लगा। कुछ मुस्लिम युवक चलती नाव पर इफ्तार कर रहे थे। खाने में चिकन/मांस शामिल था, जिसके कुछ अंश उन्होंने नदी में प्रवाहित कर दिए। काशी की जनता में आक्रोश फैलना स्वाभाविक था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह प्रशासनिक मुस्तैदी से ज्यादा प्रशासनिक सनक जैसा था!

मामले को कानूनी रूप से इतना अभेद्य बना दिया गया कि बाद में इसमें कई गंभीर गैर-जमानती धाराएं भी नत्थी कर दी गईं!

नतीजा यह हुआ कि 14 मुस्लिम युवकों को वाराणसी की स्थानीय अदालत से कोई राहत नहीं मिली। उन्हें दो लंबे महीने जेल की काल कोठरी में काटने पड़े। आखिरकार मई 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उन्हें इस शर्त पर जमानत मिली कि वे समाज से लिखित माफी मांगेंगे।

जून 2026 की घटना

लेकिन इसके ठीक तीन महीने बाद, जून 2026 में गंगा की लहरों से एक और वीडियो निकला। इस बार मंजर और भी गंभीर था। कुछ युवक नाव पर न सिर्फ चिकन पका रहे थे, बल्कि खुलेआम बियर और शराब के कैन खाली कर रहे थे!

इस मामले की कानूनी कार्यवाहियां प्रशासन के दोहरे चरित्र की सबसे बड़ी गवाह बनी!

किसी बाहरी शिकायतकर्ता के न आने पर दशाश्वमेध पुलिस ने खुद संज्ञान लिया। शुरुआती FIR में पुलिसिया कलम में भारी गुस्सा था। लिखा गया - "इन युवकों ने मां गंगा के पवित्र आंचल में मांस-मदिरा का सेवन कर करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है।" 5 हिंदू युवक गिरफ्तार हुए।

लेकिन असली खेल तब हुआ जब आरोपियों को कोर्ट में पेश करने की बारी आई! पुलिस ने जज के सामने जो अंतिम चालान पेश किया, उसमें से 'धार्मिक भावनाएं आहत करने' की तमाम गंभीर धाराएं रहस्यमयी ढंग से गायब थीं!

पुलिस ने कागजों पर इस संगीन अपराध को महज 'पर्यटकों से मामूली विवाद और शांति भंग की आशंका' का रूप दे दिया। नतीजा? गिरफ्तारी के कुछ ही घंटों के भीतर, उसी दिन सभी आरोपियों को जमानत मिल गई।

मुख्य सवाल

जब हम इन दोनों फाइलों को अगल-बगल रखते हैं, तो सवाल काशी की जनता की आहत आस्था का नहीं रह जाता, बल्कि उन कुर्सियों पर बैठे अफसरों की नीयत का हो जाता है जिन पर संविधान को निष्पक्ष रखने की जिम्मेदारी है।

अगर गंगा में मांस खाना अपराध है, तो मार्च में यह 'सांप्रदायिक साजिश और रंगदारी' कैसे बन गया और जून में महज 'पर्यटकों का आपसी विवाद' कैसे रह गया?

एक ही जैसे कृत्य के लिए 14 युवकों को राहत के लिए देश की सबसे बड़ी हाईकोर्ट्स में से एक का दरवाजा खटखटाना पड़ता है, जबकि दूसरे मामले में पुलिस खुद ही आरोपियों की ढाल बनकर उन्हें थाने के पिछले दरवाजे से रिहा करवा देती है?

भारत का संविधान अपने अनुच्छेद 14 में 'कानून के समक्ष समानता' की गारंटी देता है। लेकिन वाराणसी की ये दो घटनाएं चीख-चीखकर कह रही हैं कि जमीन पर कानून का रंग इस बात से तय होता है कि आरोपी का नाम क्या है और उसकी नाव की पतवार किस राजनीतिक रसूख के हाथ में है। यह रिपोर्ट सिर्फ गंगा की पवित्रता के उल्लंघन की कहानी नहीं है, यह हमारी न्याय प्रणाली की शुचिता के उल्लंघन की एक गंभीर दास्तान है।

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