प्रीति अहिरवार का हक छीनकर जीआरएस ने अपनी पत्नी की झोली भर दी!
कभी-कभी लगता है कि इस देश में गरीब होना सबसे बड़ा अपराध है। क्योंकि जब आप गरीब होते हैं, तो न सिर्फ आपका पसीना चूसा जाता है, बल्कि आपके नाम पर फर्जीवाड़ा करके आपकी पहचान का भी मखौल उड़ाया जाता है।
आइए, आपको ले चलते हैं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज ब्लॉक की ग्राम पंचायत इकलोद में। ज़रा इस फाइल को देखिए, पन्ने पलटिए और सोचिए कि इस लोकतंत्र में कागजों पर खेल कैसे खेला जाता है।
प्रीति कहती हैं—भाई, मैंने ग्राम पंचायत इकलोड में वी.बी.जी. राम जी योजना के तहत मनरेगा में कोई काम किया ही नहीं। और तो और, बैंक ऑफ़ बड़ौदा में मेरा कोई खाता तक नहीं है।
तो फिर सवाल यह उठता है कि अगर प्रीति ने काम नहीं किया, बैंक में खाता नहीं है, तो फिर पैसा किसके नाम पर निकला?
और जब जांच की परतें खुलती हैं, तो पता चलता है कि असली कारीगरी तो नीचे बैठे नुमाइंदों ने की है। मनरेगा मजदूरी का फर्जी आहरण कर लिया जाता है। पैसा कहाँ जाता है? सीधे ग्राम रोजगार सहायक महोदय अपनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पत्नी के खाते में ट्रांसफर करवा लेते हैं।
मतलब गजब का तालमेल है। पति महोदय रोजगार सहायक हैं, और पत्नी जी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं। मजदूरी प्रीति अहिरवार के नाम की, और मलाई सीधे घर के खाते में! क्या गजब का आत्मनिर्भर भारत है यह? जहाँ गरीब का हक सीधे बाबू के घर पहुंच जाता है।
और जब प्रीति अहिरवार ने इसके खिलाफ आवाज उठाई, जब पहली शिकायत (नंबर 18411069) दर्ज हुई, तो सिस्टम ने क्या किया? बिना उनकी अनुमति के, चुपचाप उस शिकायत को ही बंद करवा दिया। फाइल पर धूल डाल दी गई कि सब चंगा सी!
लेकिन जनता कहां मानने वाली थी। अब सीएम हेल्पलाइन पर फिर से एक नई गूंज उठी है—शिकायत क्रमांक 41327911, दिनांक 28 अक्टूबर 2026।
अब जरा सोचिए, और उन तमाम साहबों से पूछिए जो एयरकंडीशन कमरों में बैठकर 'सबकुछ ठीक है' की रिपोर्ट बनाते हैं—
क्या इस देश में एक गरीब महिला की पहचान का इस्तेमाल करके इस तरह से खुलेआम सरकारी तिजोरी पर डाका डालना न्याय है? क्या रोजगार सहायक और उसकी पत्नी पर कोई कार्रवाई होगी, या फिर यह फाइल भी किसी दराज में हमेशा के लिए दफन हो जाएगी?
