गोटेगांव में सिंघई ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस वाला कचरा गाड़ी बेच रहा?(सिमरीबड़ी और गर्रा पंचायत में..सिंघई ऑफसेट..)
नरसिंहपुर ज़िले के गोटेगांव इलाके की सैर कीजिए। यहाँ विकास के रास्ते पर एक नया कीर्तिमान गढ़ा जा रहा है। कागजों पर चलने वाले इस विकास की कहानी कुछ ऐसी है कि सुनकर आप भी कहेंगे—वाह री व्यवस्था, वाह!
क्या आपने कभी सोचा है कि एक प्रिंटिंग प्रेस वाला, जो कागज़, बिल-बुक और फ्लेक्स छापने का काम करता है, रातों-रात ऐसा कौन सा जादू कर देगा कि पंचायतों में 'लोहे का हाथ-ठेला' सीधे लग्जरी आइटम बन जाएगा?
जरा हमारे साथ गोटेगांव की पंचायतों के इस अनोखे गणित को समझिए, जहाँ विकास कागजों पर नहीं, बल्कि नोटों की गड्डियों पर दौड़ रहा है!
आखिर तीन-चार हजार की चीज पर ऐसा कौन सा टैक्स और पॉलिश लग जाती है कि उसका बिल सीधे 28 हजार के करीब पहुँच जाता है?
हैरानी की बात तो यह है कि दोनों ही पंचायतों - गर्रा (सरपंच: रेखा ठाकुर) और सिमरीबड़ी (सरपंच: रश्मी पटेल) में महिला सरपंच कमान संभाले हुए हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या महिला जनप्रतिनिधियों की आड़ में इन सचिवों और चतुर सप्लायरों द्वारा जनता के खून-पसीने की कमाई को इस तरह खुलेआम चूना लगाया जा रहा है?
पहला मामला: ग्राम पंचायत गर्रा
सरपंच: रेखा ठाकुर
सप्लायर: सिंघई ऑफसेट, गोटेगांव (प्रो. सुशील कुमार जैन)
खरीद विवरण: एक नग 'Hand Cart' (हाथ-ठेला/कचरा गाड़ी)
बिल क्रमांक: 379 (दिनांक: 24/09/2026)
कुल बिल राशि: ₹27,888.00 (मूल मूल्य ₹24,900 + 12% GST)
योजना: 5वां राज्य वित्त आयोग (5th State Finance Commission)
जब तक ऐसे फर्जीवाड़ों पर पर्दा डलता रहेगा, तब तक गांवों का विकास कागजों पर ही दम तोड़ता रहेगा।
दूसरा मामला: ग्राम पंचायत सिमरीबड़ी
सरपंच: रश्मी पटेल
सप्लायर: सिंघई ऑफसेट, गोटेगांव
खरीद विवरण: एक नग 'Hand Cart'
बिल क्रमांक: 373 (दिनांक: 24/09/2026)
कुल बिल राशि: ₹27,888.00 (मूल मूल्य ₹24,900 + 12% GST)
जरा बाजार का भाव भी टटोल लीजिए! किसी भी लोहार या दुकान पर चले जाइए, ऐसा सामान्य हाथ-ठेला बमुश्किल 3 से 5 हजार रुपये में मिल जाता है! यानी ठेला आया महज तीन-चार हजार का, और कागजों में बिल बन गया पूरे सत्ताईस हजार आठ सौ अट्ठासी रुपये (₹27,888) का?
महिला सशक्तिकरण का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि दस्तखत और मुहरों की आड़ में खेल कोई और ही खेल रहा है। जनता के खून-पसीने की कमाई, जो 5वें राज्य वित्त आयोग के नाम पर आती है, उसे इस तरह पानी की तरह बहाया जा रहा है, मानो 28 हज़ार का ठेला खरीदना कोई आम बात हो।
सवाल यह नहीं है कि एक प्रिंटिंग प्रेस वाला ठेला क्यों बेच रहा है। सवाल यह है कि इस देश में 'अंधेर नगरी चौपट राजा' की यह कहानी कब तक चलती रहेगी?
क्या स्थानीय प्रशासन, क्या जनपद और जिला पंचायत के नुमाइंदे इन बिलों को कभी पलटकर नहीं देखते? या फिर सबको पता है कि "सबकी मलाई इसमें तय है"?
सोचिए इस बारे में। क्योंकि जब तक आप और हम इन छोटे-छोटे आंकड़ों पर सवाल नहीं उठाएंगे, तब तक विकास के नाम पर ऐसे ही ठेले हमारी व्यवस्था को कुचलते रहेंगे।

