हम दिवाली कैसे मनाएंगे?
क्या आपने सोचा है कि स्वतंत्र पत्रकार दिवाली कैसे मनाएंगे?
जानता हूं आपके इस सवाल के कोई मायने नहीं है? यहां किसी को भी इतना सोचने की फुर्सत कहां है?
लेकिन फिर भी इससे सवाल तो खत्म नहीं हो जाता है न!
वो स्वतंत्र पत्रकार जो ईमानदारी और निष्पक्षता से अपना काम कर रहे हैं! उन्हें सत्ता से विज्ञापन तो मिलेगा ही नहीं!जाहिर सी बात है इतनी आलोचनाएं और सवाल सामने हो तो विज्ञापन क्यों देंगे भला!
बड़े अखबारों के पत्रकारों को तो फिर भी विज्ञापन विभाग का सपोर्ट होता है।लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि स्वतंत्र पत्रकार की निजी जिंदगी किस दौर से गुजरती है?
शायद नहीं सोचा होगा!
कम वेतन/टारगेट बेस कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार वर्ग की दिवाली फीकी रहने वाली है।सच तो यह है कि इस देश में पत्रकारों की आर्थिक स्थिति, उनके मानसिक तनाव और उनकी सुरक्षा को लेकर कभी किसी हुक्मरान ने गंभीरता नहीं बरती।
सरकारों ने कागजी भाषणों के अलावा इस दिशा में एक ढेला तक नहीं उठाया। नतीजा यह है कि आज पत्रकारों का एक बहुत बड़ा तबका सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों के टारगेट पर जिंदा रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है।
हम यह नहीं कहते हैं कि, पत्रकारों से खबर लगवाने के बदले में उन्हें पैसे दीजिए,लेकिन आपको खुद यह समझना होगा कि हर सेवा पूरी तरह से निःशुल्क संभव नहीं है!सच चाहिए वह भी निष्पक्षता,पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ तो आपको मदद के लिए आगे आना चाहिए!
आप जो सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ खबरें पढ़ते हैं, जो भ्रष्टाचार के खुलासे देखकर ताली बजाते हैं-याद रखिए, हर वह रिपोर्ट, हर वह इन्वेस्टिगेशन आपके भरोसे और हमारे पत्रकारों के खून-पसीने की मेहनत से मुमकिन होता है।
आप इस दिवाली हमारे पत्रकारों के काम में सीधे सहयोग देकर, इस देश की आखिरी बची हुई स्वतंत्र पत्रकारिता को बचा सकते हैं। आपका एक छोटा सा सहयोग, एक छोटी सी आर्थिक मदद... किसी के घर में सिर्फ दीये नहीं जलाएगी, बल्कि इस अंधेरे तंत्र में सच की मशाल को बुझने से बचा लेगी।
आगे आइए! इस दिवाली सिर्फ अपने घर के दिए मत जलाइए, बल्कि सत्य और निष्पक्ष पत्रकारिता को भी मजबूत कीजिए।
यह समय सोचने का है, और साथ खड़े होने का है। आप सभी को स्वतंत्र और बेबाक पत्रकारिता की तरफ से दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
