सत्ता के ताबूत पर gen z ने ठोकी पहली कील?
(भा.ज.पा. के राजनीतिक पतन की शुरुआत....??)
"हालिया घटनाओं पर यदि विश्लेषण करें तो आप पाएंगे कि, आलोचकों का आरोप रहा है कि महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।"
देश के अनेक हिस्सों से मंदिरों में गबन की अनेक घटनाएं सामने आई! कहीं कागज पर अस्पताल चल रहे थे तो कहीं कागज पर ही स्कूल-कालेज चल रहे थे!
इसके साथ ही स्थानीय पंचायतों में गबन और जातिगत राजनीति हावी होती हुई दिखाई दे रही थी!
बावजूद इसके कि इन मुद्दों को गंभीरता से किया जाता जनता को हिंदू मुस्लिम और स्वर्ण बनाम दलित के मुद्दे में उलझाए रखने के अनेक सफल असफल प्रयास किए गए!
नतीजा देश में सामुदायिक द्वेष बढ़ता गया और इस जहरीली हवा ने अनेक नौ जवानों की जिंदगी लील ली! किसने किसको मारा से ज्यादा जरूरी यह था कि, आखिर ऐसे हालात ही पैदा क्यों किए जा रहे थे!
सिर्फ सत्ता ही नहीं मीडिया का एक हिस्सा भी इस खेल को खेल रहा था! करोड़ों की सेटेलाइट फीस चुकाने और न्यूजरूम से लेकर ऑफिस स्टाफ के खर्चे के लिए विज्ञापनों का मोहताज है,जाहिर सी बात है जब सत्ता पक्ष से मनचाहे विज्ञापन मिलेंगे तो दिखाया भी वही जाएगा जो सत्ता चाहेगी!
लेकिन इस बीच डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट और यूट्यूबर्स ने अग्रिम पंक्ति का मोर्चा संभाला! जनता ने डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट और यूट्यूबर्स के काम को पसंद किया! हालाँकि सीमित संसाधनों ने डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट की रफ़्तार पर असर भी डाला!
लेकिन जब यह सब चल रहा था, तब युवा सो नहीं रहा था! वह हर हालात पर नजर रखे हुए था!इसी बीच छात्र आंदोलन की शुरुआत होती है और और युवाओं को अपने मुद्दे को सार्वजनिक रूप से जनता के सामने लाने के लिए एक प्लेटफार्म मिला!
जंतर मंतर पर जुटे युवाओं के लिए यह सिर्फ सीजेपी के समर्थन का सवाल नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों और मुद्दों को आवाज़ देने का एक मंच भी है।
क्या आप सोच भी सकते हैं कि, कल तक आप जिन बच्चियों को पापा की परी कहकर उपहास उड़ाया करते थे, वे बच्चियां अकेली ("माता-पिता के बिना") सत्ता की बेरहम लाठियों के सामने खड़ी थीं!और यह किसी एक-दो बेटियों की बात नहीं है,हजारों हजार की तादाद में लड़कियां प्रोटेस्ट के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर लाठीचार्ज का विरोध कर रही थी!
सरकार यदि चाहती तो पहले या दूसरे हफ्ते में ही प्रोटेस्टर्स से बात कर सकती थी आखिर अंत में भी बात करना तो पड़ी ही ना!
लेकिन ऐसा लगता है जैसे, सरकार अपनी लाडली बहना और सम्मान निधि जैसी योजनाओं और मंदिर बना देने के गुमान में थी!
देश के कई हिस्सों से ऐसे मामले सामने आए जिन्होंने शासन और प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए। अयोध्या राम मंदिर की दान राशि के कथित गबन का मामला हो या इंदौर के 100 बेड अस्पताल का वर्षों तक कागज़ों में ही संचालित रहने का मामला- इन घटनाओं ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठाए।
सत्ता का अहंकार शायद उसे झुकने नहीं दे रहा था! सरकार ने शायद सोचा नहीं था कि, युवा इस कदर भी नाराज हो सकता है!
लेकिन इस नए भारत के युवा ने सत्ता को यह संदेश दे दिया है कि अब वह सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि राजनीति का सक्रिय भागीदार है। यदि उसकी आवाज़ को अनसुना किया गया, तो आने वाले चुनावों में इसका असर दिखाई दे सकता है।
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