नरसिंहपुर में 'समानांतर सरकार': क्या लोकतंत्र में बिना पद के 'दरबार' लगाना जायज है?
विशेष टिप्पणी | जनप्रतिनिधित्व, प्रशासन और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर बड़ा सवाल
नरसिंहपुर के जागरूक नागरिकों, अब चुप रहने का नहीं बल्कि व्यवस्था से सीधे सवाल करने का वक्त है!
लोकतंत्र में जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है ताकि वह संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर काम करे। लेकिन हमारे नरसिंहपुर में एक अजीब ही परंपरा चल पड़ी है।
पूर्व राज्यमंत्री और पूर्व विधायक जालम सिंह पटेल के पास आज की तारीख में न तो कोई संवैधानिक पद है और न ही कोई प्रशासनिक अधिकार।
इसके बावजूद, उनके द्वारा सरकारी स्थलों का ताबड़तोड़ 'निरीक्षण' करना और अधिकारियों की मौजूदगी में 'जनसुनवाई का दरबार' लगाना सीधे-सीधे व्यवस्था को चुनौती जैसा प्रतीत होता है।
जिले के हर सजग नागरिक को इन 3 तीखे सवालों पर विचार करना होगा
❓ पहला सवाल
जब जालम सिंह पटेल वर्तमान में किसी पद पर नहीं हैं, तो वे किस कानूनी हैसियत से सरकारी कार्यालयों का आधिकारिक निरीक्षण कर रहे हैं?
क्या यह सिर्फ पारिवारिक और राजनीतिक रसूख का खुला प्रदर्शन नहीं है?
❓ दूसरा सवाल
नरसिंहपुर का स्थानीय प्रशासन इतना लाचार और नतमस्तक क्यों दिखाई देता है? कलेक्टर और अन्य जिम्मेदार अधिकारी बिना पद के एक नेता के सामने प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाने की अनुमति कैसे दे रहे हैं?
क्या प्रशासनिक जवाबदेही सिर्फ रसूखदारों के लिए बदल जाती है?
❓ तीसरा और अंतिम सवाल
क्या यह मौजूदा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (विधायक/सांसद) के अधिकारों का खुला अतिक्रमण और नरसिंहपुर की जनता के ताजा जनादेश का सीधा अपमान नहीं है?
यह जनसेवा है या समानांतर सत्ता?
एक राजनेता के तौर पर जनता के बीच जाना और उनकी समस्याएं सुनना उनका अधिकार है। लेकिन सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके, अधिकारियों को निर्देश देकर समानांतर व्यवस्था चलाना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक बेहद गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
अधिकारियों को यह याद रखना होगा कि उनकी तनख्वाह जनता के टैक्स से आती है और उनकी वफादारी सिर्फ और सिर्फ भारत के संविधान और कानून के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी नेता के पारिवारिक या राजनीतिक रसूख के प्रति।
नरसिंहपुर की जनता सब देख रही है। लोकतंत्र में असली ताकत 'दरबार' सजाने वाले रसूखदारों के पास नहीं, बल्कि पोलिंग बूथ पर 'बटन' दबाने वाले आम नागरिक के हाथ में होती है।
