पुस्तक मेला बना तमाशा! प्रशासन की आदत बन गया झूठ?: नरसिंहपुर
नरसिंहपुर में आयोजित पुस्तक मेले को लेकर प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आया है। एक तरफ प्रशासन ने दावा किया कि पुस्तक मेले में अभिभावकों को 10 से 15 प्रतिशत तक किताबों पर और 30 से 50 प्रतिशत तक कॉपियों पर आकर्षक छूट दी गई, वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में अभिभावकों ने आरोप लगाया कि अधिकांश स्कूलों की किताबें ही उपलब्ध नहीं थीं और मेला केवल औपचारिकता बनकर रह गया।
किताबें नहीं, सिर्फ औपचारिकता
जिला मुख्यालय में आयोजित पुस्तक मेले से अभिभावकों को राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन जमीन पर स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई दी। बताया गया कि मेले में केवल 5 दुकानदार ही शामिल हुए और उनके पास भी सीमित संख्या में किताबें थीं! कई दुकानों पर प्रत्येक कक्षा के केवल 5 से 10 सेट ही उपलब्ध थे, जो मांग के मुकाबले बेहद कम साबित हुए!
खासकर निजी स्कूलों की किताबें नहीं मिलने से अभिभावकों में भारी नाराजगी देखी गई! कई अभिभावक बच्चों को लेकर मेले में पहुंचे लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा! इससे यह सवाल उठने लगा कि जब पर्याप्त स्टॉक ही नहीं था, तो फिर इस मेले का उद्देश्य क्या था?
प्रशासन ने बताया भारी छूट
दूसरी ओर प्रशासनिक जानकारी में दावा किया गया कि मेले में आकर्षक छूट दी गई और अभिभावकों को राहत मिली। उदाहरण के तौर पर बताया गया कि कक्षा सातवीं का सेट बाजार में 2255 रुपये का था, जबकि मेले में 1975 रुपये में उपलब्ध कराया गया। इसी प्रकार कक्षा चौथी का सेट 1789 रुपये के बजाय 1521 रुपये में उपलब्ध बताया गया।
शुभारंभ के बाद जिम्मेदार गायब
सूत्रों के अनुसार मेले का उद्घाटन तो जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ, लेकिन उसके बाद व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं रहा। इससे मेले की व्यवस्था पूरी तरह बिखरी हुई नजर आई।
नया स्टॉक नहीं, फिर मेला क्यों?
दुकानदारों के अनुसार मेले के लिए कोई नया स्टॉक ही नहीं मंगाया गया था। पुराने सीमित स्टॉक के साथ मेला आयोजित कर दिया गया, जिससे अधिकांश अभिभावकों को निराशा हाथ लगी।
अभिभावकों में नाराजगी
कई अभिभावकों ने कहा कि यदि प्रशासन को पहले से पता था कि पर्याप्त किताबें उपलब्ध नहीं होंगी, तो इस तरह का मेला आयोजित करने का क्या औचित्य था? लोगों का कहना है कि इससे अभिभावकों का समय भी बर्बाद हुआ और उम्मीद भी टूटी।
क्या प्रशासन केवल फोटो और औपचारिकता के लिए ऐसे आयोजन कर रहा है?
क्या अभिभावकों को राहत देने के नाम पर केवल कागजी दावे किए जा रहे हैं?
नरसिंहपुर का यह पुस्तक मेला अब सवालों के घेरे में है। एक तरफ प्रशासन राहत का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अभिभावकों की नाराजगी और खाली हाथ लौटने की हकीकत सामने आ रही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह पुस्तक मेला राहत से ज्यादा अव्यवस्था और विरोधाभास का प्रतीक बनकर रह गया।
