आमगांव में सूचना, बुलावा और सच की दस्तक
आमगांव में सूचना माँगी गई।
सिर्फ कागज़ नहीं… हिसाब माँगा गया।
और जवाब आया —
“आ जाइए… पूर्व प्रक्रिया है।”
ये शब्द छोटे हैं, पर इनके पीछे जो भाव है वो बड़ा है।
क्यों बुलाया जा रहा है?
क्या सूचना देने के लिए चेहरा देखना ज़रूरी है?
या फिर चेहरा देखकर इरादा बदलवाना आसान होता है?
पत्रकार जब सूचना माँगता है,
तो वह दुश्मनी नहीं करता —
वह जनता की ओर से सवाल पूछता है।
पर यहाँ सवाल पूछने वाले को ही बुलावा भेजा जा रहा है।
यह सिर्फ प्रशासनिक पत्र नहीं लगता…
यह एक मनोवैज्ञानिक चाल भी हो सकती है।
गाँव में लोग धीरे से पूछ रहे हैं — “क्या बात है जो कागज़ में नहीं दी जा सकती?”
और सच बताऊँ,
यही फुसफुसाहट असली कहानी है।
पत्रकार का काम डरना नहीं है।
लेकिन यह भी सच है —
जब सामने “प्रक्रिया” का नाम लेकर बुलाया जाता है,
तो यह संकेत होता है कि सवाल सही जगह लगा है।
दिल की बात
अगर सब ठीक है,
तो कागज़ भेजिए।
अगर कुछ ठीक नहीं है,
तो बुलाइए…
हम भी आएँगे।
रिकॉर्डर भी आएगा।
और सवाल भी।
अब फैसला 9 मार्च का नहीं है। फैसला इस बात का है कि आमगांव में सच कागज़ पर चलेगा या कुर्सियों के बीच फँसेगा।
