ईरान का यह इतिहास भारत को है याद?
इतिहास सिर्फ तारीखों का खेल नहीं होता, इतिहास रिश्तों की नीयत भी याद रखता है।
1965 और 1971… दो ऐसे साल जब भारत ने पाकिस्तान के साथ निर्णायक युद्ध लड़ा। उस दौर में ईरान में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी की सरकार थी। और उस समय ईरान किसके साथ खड़ा था — यह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
ईरान और पाकिस्तान दोनों CENTO के सदस्य थे। यह वही सैन्य गठबंधन था जो शीत युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी खेमे का हिस्सा था।
1965 — जब कौन किसके साथ खड़ा था?
जब 1965 के युद्ध में पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान पर हथियार प्रतिबंध लगाया, तब ईरान ने “हथियार एजेंट” की भूमिका निभाई।
प्रतिबंधों के बीच भी पाकिस्तान तक संसाधन पहुँचते रहे। सवाल यह नहीं कि कितने हथियार गए… सवाल यह है कि नीयत किस तरफ थी?
सवाल सिर्फ इतना नहीं कि हथियार किसने दिए… सवाल यह है कि उस दौर में नीयत किसके पक्ष में थी?
उस समय ईरान और पाकिस्तान दोनों CENTO के सदस्य थे — अमेरिका समर्थित पश्चिमी सैन्य गठबंधन का हिस्सा। शीत युद्ध की राजनीति में खेमेबाज़ी साफ थी, और भारत उस खेमे में नहीं था।
1971 — जब युद्ध निर्णायक था
1971 में जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम अपने चरम पर था, तब हालात और भी गंभीर थे। उसी दौर में ईरान में शासन था 4 का।
पाकिस्तान को हेलीकॉप्टर, गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स उधार दिए गए। इतना ही नहीं, ईरानी हवाई अड्डों का उपयोग पाकिस्तानी विमानों को सुरक्षित रखने के लिए किया गया।
युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं लड़ा जाता — कभी-कभी वह रनवे पर खड़े विमानों की सुरक्षा में भी छिपा होता है।
फिर 1979 में बदली तस्वीर
1979 में ईरानी क्रांति हुई। शाह की सत्ता गई, इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई।
इसके बाद भारत और ईरान के रिश्तों में धीरे-धीरे गर्माहट आई।
ऊर्जा, कूटनीति और सामरिक सहयोग के नए अध्याय खुले।
वहीं दूसरी ओर, ईरान-पाकिस्तान संबंधों में समय-समय पर तनाव भी दिखा — सीमा सुरक्षा, आतंकी गतिविधियाँ और क्षेत्रीय राजनीति के कारण।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि पुराना इतिहास मिट गया?
संपादकीय सवाल
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते — सिर्फ हित होते हैं। आज के मित्र कल के विरोधी रहे हों, यह असंभव नहीं।
राष्ट्र को भावनाओं से नहीं, स्मृति और रणनीति से चलना चाहिए।
भारत को किसी से शत्रुता नहीं रखनी चाहिए, लेकिन इतिहास की समझ के बिना कूटनीति भी अधूरी रहती है। सवाल बदले की भावना का नहीं, जागरूकता का है।
