वैसे भक्त होना बहुत अच्छी बात है,यदि वाकई में भक्त सेवा की कुर्सी पर बैठ जाए तो यह देश धन्य हो जाए!हालांकि ऐसा होता बहुत कम है!
अब नरसिंहपुर जिले के हाल ही देख लो! यहां भी बहुत प्रकार के भक्त आपको दिख जायेंगे, , कुछ राजनीतिक भक्त हैं तो कुछ प्रशासनिक! उदाहरण आपके सामने है : जिले में ऐसे जन प्रतिनिधि भी हैं,जो खुद को मैया का भक्त होने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ रेत खनन की चर्चाओं में उनका नाम सुनाई देता है!
ऐसा ही हाल कुछ प्रशासनिक भक्तों का भी है, लोग गांवों को लुटे जा रहे हैं,हर दिन लाखों रुपए का गोलमाल हो रहा है, फाइलों पर फाइलें दबाई जा रही है लेकिन मजाल कि भक्ति पर कोई फर्क पर पड़ जाए!
ऐसे प्रशासनिक भक्तों का बस इतना ही मानना है कि, खुद भी खाओ दूसरों को भी खाने दो!कोई किसी के खाने में टांग नहीं अड़ाएगा!
अरे क्या हुआ अगर पंचायत में फर्जी बिल लग रहे हैं तो, क्या हुआ अगर कागजी तालाब बना दिए, पुरानी सड़क को नया दिखाकर बिल का भुगतान ले लिया, , अरे कोई गुनाह किया है क्या सरकारी पैसे को अपनी तिजोरी में रखकर?
और फिर भक्त तो भक्त हैं, उनको ऐसी बातों से फर्क नहीं पड़ता!
भक्तों को तो सेवा, भजन, कीर्तन, मान सम्मान और मुस्कान ही प्रिय होती है! क्यों कि छोटे से पान प्रसाद से बड़े बड़े काम हो जाते हैं,यही तो है भक्त और भक्ति की माया!
रही बात जनता की , ,तो जनता के लिए भंडारे है न, , राजनीतिक भक्तों के राजनीतिक भंडारे है तो प्रशासनिक भक्तों के प्रशासनिक भंडारे भी होते हैं, ,बस आम आदमी की वहां तक पहुंच नहीं होती!
भक्ति के चश्में से देखिए आनंद ही आनंद है! बस प्रसाद अगली बार से थोड़ा अच्छा लाइयेगा, लैया चिरौंजी से अब काम नहीं चलता है! मिश्री मावा मेवा की बात ही अलग होती है!
