भिखारियों का नेटवर्क!: मोटे कमीशन के एवज में एरिया होता है निर्धारित?
अक्सर आपने भी ऐसी अनेक महिलाओं को भीख मांगते हुए देखा होगा जो अपने साथ दुधमुंहे छोटे बच्चों को रखती हैं और लोग बच्चे की हालत पर तरस खाकर कुछ न कुछ भीख में दे देते हैं!
हमने भिखारियों के जीवन की सच्चाई को जानने का प्रयास किया! लगातार तीन दिनों तक नरसिंहपुर से गोटेगांव और जबलपुर से कटनी तक इन भिखारियों के समूह पर नजर रखी! इनके डेरों तक पहुंचकर भिखारी महिलाओं और बच्चों की हकीकत को कैमरे की नजर में कैद किया!
हमने अपनी पड़ताल में जाना कि, अधिकतर भिखारी महिलाएं देह व्यापार में लिप्त नहीं रहती हैं, हालांकि इनके समुदाय में अनैतिक संबंधों को सामान्य माना जाता है!
जैसे ही हमने गहराई से जांच शुरू की, कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। यह कोई बिखरी हुई मजबूरी नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र जैसा नजर आता है। हर चौराहा, हर मंदिर, हर बस स्टैंड—इन सब जगहों पर “एरिया” पहले से तय होता है।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ लोग ऐसे हैं जो इन भिखारियों के पूरे समूह को नियंत्रित करते हैं। कौन कहां बैठेगा, किस दिन कौन सा इलाका मिलेगा—यह सब पहले से तय होता है। बदले में रोज की कमाई का एक हिस्सा ऊपर तक पहुंचाया जाता है।
👉 कुछ महिलाओं ने कैमरे से दूर यह स्वीकार किया कि, उन्हें “लाइन” में रहने के लिए रोजाना तय रकम देनी पड़ती है!
👉 अगर कोई नियम तोड़ता है, तो उसे उस इलाके से भगा दिया जाता है!
👉 कई मामलों में छोटे बच्चों को जानबूझकर इस काम के लिए साथ रखा जाता है, ताकि सहानुभूति जल्दी मिले!
हमारी पड़ताल में यह भी संकेत मिले कि, कुछ मामलों में बच्चों को किराए पर लाने जैसी बातें भी सामने आईं, हालांकि इसकी पुष्टि के लिए और गहराई से जांच जरूरी है।
गोटेगांव कनेक्शन: कमीशन सिस्टम का दूसरा चेहरा?
इसी तर्ज पर गोटेगांव में भी एक नाम बार-बार सामने आ रहा है…
स्थानीय लोगों और कुछ भिखारियों से हुई बातचीत में “टकले” नाम से चर्चित एक शख्स का जिक्र कई बार सुनने को मिला। हालांकि यह व्यक्ति सीधे तौर पर भिखारियों के नेटवर्क से जुड़ा हुआ नहीं बताया गया, लेकिन किन्नरों और अवैध वेंडरों के बीच चलने वाली कमीशनबाजी में इसकी भूमिका होने के आरोप जरूर सामने आए हैं।
सूत्र बताते हैं कि, शहर के कुछ प्रमुख चौराहों, बाजार क्षेत्रों और बस स्टैंड के आसपास बैठने वाले किन्नरों और ठेला-फेरी करने वाले वेंडरों से नियमित रूप से वसूली की जाती है। इसके एवज में उन्हें “सुरक्षित एरिया” दिया जाता है, जहां कोई दूसरा दखल नहीं दे सकता।
👉 कई वेंडरों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनसे रोजाना या साप्ताहिक रूप से पैसे लिए जाते हैं।
👉 विरोध करने पर सामान हटवाने या नगर पालिका की कार्रवाई का डर दिखाया जाता है।
👉 कुछ मामलों में “सेटिंग” के नाम पर मोटी रकम भी मांगी जाती है।
हालांकि, इस पूरे मामले में जिस “टकले” का नाम सामने आ रहा है, उसकी भूमिका को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है। लेकिन बार-बार एक ही नाम का सामने आना, कई सवाल जरूर खड़े करता है।
यह मामला अब सिर्फ भीख मांगने या छोटे-मोटे धंधों तक सीमित नहीं दिखता… बल्कि यह एक बड़े अनौपचारिक “कमीशन सिस्टम” की ओर इशारा करता है।
सवाल प्रशासन से
क्या प्रशासन को इसकी भनक नहीं है?
या फिर सब कुछ जानकर भी अनदेखा किया जा रहा है?
अगले भाग में और खुलासे, और सबूत और जमीनी हकीकत सामने आएगी…
© Stringer24 News | सत्य और समाज के बीच की कड़ी
