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ग्राम बसुरिया।

जिस तरह सरकार ने गांव के लिए पैसा पहुंचाया अगर वह पूरा विकास कार्यों पर खर्च हो पाता तो आज बसुरिया गांव की तस्वीर सुंदर हो सकती थी!

सूत्र कहते हैं की,कमीशन खोरी,हिस्सा और लिफाफा प्रथा अब भी हावी है।विकास के लिए आई राशि का बड़ा हिस्सा सिर्फ नीचे से ऊपर तक पहुंचाने में ही खर्च हो जाता है।काम कोई भी हो हर किरदार के दाम तय हैं,कहा तो यहां तक भी जाता है की सबको मैनेज करना पड़ता है,इसलिए सब चलता है।विश्वानीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक काम प्रारंभ होने के पूर्व ही अपने अपने हिस्से को लेकर पहले ही बोली लगा दी जाती है।

सड़क,नाली,आंगनवाड़ी,स्वच्छता,मेढ़ बंधन, तालाब, सोक पिट,विद्युत व्यवस्था,बच्चों के लिए गुणवत्ता युक्त भोजन,मनरेगा का उचित क्रियान्वयन जैसी अनेक बातें है जो विकास की दिशा में सार्थक और मील का पत्थर सिद्ध हो सकती थी।

लेकिन आज अराजकता अपने चरम पर है।ग्रामीण कहते हैं की भ्रष्टाचार ने गांव के विकास को अवरुद्ध किया है।

हाट बाजार,स्कूल,चरनोई भूमि,तालाब एवम गांव के अन्य हिस्से अतिक्रमण की भेंट चढ़ने लगे,और ग्राम पंचायत मूक दर्शक बनकर कठपुतली का तमाशा देख रही थी।


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