सांकल रोड मामले में 215 परिवारों के भविष्य पर संकट?: नरसिंहपुर
अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही पर यदि उंगली उठाई जाए तो फिर आप विकास की कल्पना को कभी साकार नहीं कर सकेंगे! लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि 215 परिवारों के भविष्य के बारे में ना सोचा जाए!
देखिए इस मामले में शासन प्रशासन वैकल्पिक स्थितियों की संभावनाओं पर विचार कर सकता है! यह कोई रॉकेट साइंस की तरह बेहद जटिल काम तो नहीं है!
215 परिवारों के विस्थापित होने की बात ही भयावह है! क्या आप जानते हैं कि ये परिवार किस तरह खौफ के साए में रह रहे हैं? हर पल भविष्य की चिंता!
अब जरा उस दृश्य की कल्पना कीजिए, जहां एक तरफ बुलडोज़र खड़ा है… और दूसरी तरफ एक मां अपने बच्चों के स्कूल बैग को समेट रही है, यह सोचकर कि कल ये छत रहेगी भी या नहीं!
यह सिर्फ “अतिक्रमण” नहीं है… यह किसी का घर है, किसी की जिंदगी की जमा पूंजी है, किसी की यादों का ठिकाना है!
सवाल यह नहीं कि सड़क चौड़ी होनी चाहिए या नहीं… सवाल यह है कि क्या विकास की इस दौड़ में इंसान पीछे छूट जाएगा?
क्या इन 215 परिवारों को सिर्फ “अवैध कब्जाधारी” मान लेना ही पर्याप्त है? या फिर उन्हें नागरिक मानते हुए उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है?
क्या यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि कागजों में यह महज एक “प्रोजेक्ट” है… लेकिन जमीन पर यह 215 परिवारों की जिंदगी का सबसे बड़ा संकट बन चुका है?
बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की दवाइयां, रोज़ी-रोटी के साधन — क्या इन सबका कोई हिसाब इस कार्यवाही में शामिल है?
या फिर एक नोटिस… और उसके बाद सीधी कार्रवाई?
प्रशासन के सामने परीक्षा
- क्या प्रशासन पहले पुनर्वास की व्यवस्था करेगा?
- क्या प्रभावित परिवारों को कोई निश्चित समयसीमा और भरोसा मिलेगा?
- क्या “विकास” और “संवेदनशीलता” साथ-साथ चल सकते हैं?
सड़कें जरूर बनें… लेकिन उन रास्तों पर चलते हुए किसी की जिंदगी उजड़ने की कीमत पर नहीं!
नरसिंहपुर के इस सांकल रोड मामले में अब सिर्फ कार्रवाई नहीं… संवेदनशील निर्णय की जरूरत है!
क्योंकि 215 परिवार सिर्फ एक आंकड़ा नहीं हैं…
वे 215 कहानियां हैं, जो आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं!
