नरसिंहपुर में पत्रकार हफ्ता वसूली कर रहे हैं?: माफिया और करप्शन को संरक्षण दे रहा मीडिया?
विगत कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर माफिया को संरक्षण दिए जाने के आरोप लग रहे हैं!
दरअसल चिचली थाना प्रभारी द्वारा यह कहे जाने के बाद कि, "पत्रकार केवल दारू के लिए आते हैं" — मामला और भी संगीन हो गया है!
हालांकि यह अब तक स्पष्ट नहीं है कि, कितने पत्रकार शराब के लिए चौकी की हाजरी दे रहे थे! स्वाभाविक सी बात है कि, चौकी पर दारू के लिए जाने वाले इन पत्रकारों के नाम सार्वजनिक किए जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया!
निष्पक्षता और पारदर्शिता का राग अलापने वाला मीडिया खुद इस मुद्दे पर खामोश क्यों है?
मीडिया ने मामले पर दो शब्द लिखना तक जरूरी नहीं समझा! सच्चाई और ईमानदारी के ठेके का हल्ला मचाने वाले ये पत्रकार वसूली के मामले पर चुप्पी साधे हुए नजर आ रहे हैं!
वहीं दूसरी ओर यह भी सामने आता है कि स्थानीय स्तर पर इस मामले की चर्चाएं तो खूब होती हैं, लेकिन निजी स्वार्थों के चलते कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। सवाल यह उठता है कि क्या यही मौन अघोषित संरक्षण है?
पुराने मामलों में भी उठे थे सवाल
ऐसा नहीं है कि पत्रकारों पर इस तरह के आरोप कोई नई बात है! इससे पहले गाडरवारा में जुआरियों से हफ्ता वसूली की चर्चा ने भी सुर्खियां बटोरी थीं, जिसमें 32 पत्रकारों की सूची को लेकर कई सवाल उठे थे, लेकिन जवाब आज तक नहीं मिल सके!
शराब, गांजा और सट्टा माफिया से पत्रकारों द्वारा वसूली की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं, लेकिन हर बार इन मामलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है!
बड़ा सवाल — थाने से शराब मांगने की हैसियत रखने वाले पत्रकार आखिर हैं कौन?
जाहिर सी बात है कि पुलिस चौकी से शराब मांगने वाले ये लोग कोई छोटे-मोटे फर्जी यूट्यूबर नहीं हो सकते! अगर ऐसा होता तो अब तक कार्रवाई हो चुकी होती!
तो क्या यह मान लिया जाए कि सिस्टम के भीतर ही कुछ "सेटिंग वाले चेहरे" सक्रिय हैं?
सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर नरसिंहपुर के पत्रकारों की जमकर किरकिरी हो रही है।
"थाने में हर महीने बंदी दी जाती है, जहां अपराध को संरक्षण देने के लिए रिश्वत दी जाती है!"
"पुलिस ही अपने फायदे के लिए फर्जी पत्रकार पैदा करती है!"
क्या फर्जी पत्रकार इतनी हिम्मत कर सकते हैं?
क्या कोई फर्जी पत्रकार इतनी हिम्मत कर सकता है कि वह सीधे पुलिस से शराब मांगे? क्या यह बिना संरक्षण के संभव है?
या फिर सच कुछ और ही है, जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है?
यही कारण है कि शहर में सट्टा, जुआ, शराब और गांजा का कारोबार खुलेआम चलता दिखाई देता है, लेकिन कार्रवाई कहीं नजर नहीं आती!
जब पत्रकार ही मैनेज हो जाएं, तो खबर का असर कैसे होगा?
सीधी बात है — प्रशासन भी इस हफ्ता वसूली से अंजान नहीं हो सकता!
निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ पत्रकारिता पर सवाल नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की साख पर सवाल है!
अगर चौथा स्तंभ ही कमजोर या भ्रष्ट हो जाए, तो जनता की आवाज कौन उठाएगा?
