करप्शन पर सिस्टम की चुप्पी बता रही है, संरक्षण की छत्रछाया के जिम्मेदार हम है?
शायद इसलिए ही गबन और भ्रष्टाचार के मामलों पर सुनवाई की नौटंकी तो होती है लेकिन निराकरण नहीं!
रिश्वतखोर अधिकारियों ने बेशर्मी की चादर ओढ़ ली है — लिफाफे मिलते रहना चाहिए कमीशन के… बाकी सब जाए चूल्हे में?
❓ आखिर ये कैसी व्यवस्था है?
जहाँ फाइलें तभी चलती हैं जब उन पर “वज़न” रखा जाए? जहाँ शिकायतें रजिस्टर में दर्ज होकर धूल फांकती हैं और आरोपी कुर्सी पर जमे रहते हैं? जहाँ जांच समितियाँ बनती हैं, बयान लिए जाते हैं, प्रेस नोट जारी होते हैं… और फिर सब कुछ ठंडे बस्ते में?
क्या सचमुच दोष केवल उन अधिकारियों का है जो खुलेआम दलाली का कारोबार चला रहे हैं? या फिर हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जो हर बार कहते हैं — “सिस्टम ऐसा ही है” और चुप रह जाते हैं?
📂 कागज़ों में विकास, ज़मीन पर विनाश
गबन की रकम बढ़ती जाती है, योजनाएँ कागजों पर पूरी हो जाती हैं, सड़कें उद्घाटन से पहले टूट जाती हैं, शौचालय बिना दरवाज़े के खड़े रहते हैं, और बिल पास हो जाते हैं “समय पर कार्य पूर्ण” लिखकर। क्या यह महज़ लापरवाही है… या फिर सुनियोजित साझेदारी?
कार्रवाई की फाइल भी उन्हीं के विभाग से होकर गुज़रेगी। जांच भी “अपने” करेंगे और निष्कर्ष भी “सुविधानुसार” निकलेगा।
😶 चुप्पी ही मौन समर्थन है?
बेशर्मी का स्तर इतना बढ़ चुका है कि अब भ्रष्टाचार छिपाया नहीं जाता, बल्कि उसे “प्रक्रिया” का नाम दे दिया जाता है। “थोड़ा बहुत तो चलता है” — यह वाक्य ही सबसे बड़ा अपराधी है। इसी सोच ने ईमानदारी को हाशिए पर और दलाली को मुख्यधारा में ला खड़ा किया है।
जब शिकायतकर्ता को ही परेशान किया जाता है, जब सच बोलने वाले को “विरोधी” और “समस्या पैदा करने वाला” कह दिया जाता है — तब समझ लीजिए कि बीमारी केवल दफ्तरों में नहीं, मानसिकता में घर कर चुकी है।
भ्रष्टाचार उतना ही ताकतवर है, जितनी हमारी चुप्पी।
अब तय हमें करना है — हम लिफाफों की संस्कृति को सामान्य मानते रहेंगे? या फिर सवाल पूछने की हिम्मत जुटाएँगे?
